रेवाड़ी। परम पूज्य आचार्य श्री 108 अतिवीर जी मुनिराज ने दशलक्षण महापर्व के अवसर पर अतिशय क्षेत्र नसियां जी में आयोजित श्री तीस चौबीसी महामण्डल विधान में धर्म के नवम लक्षण “उत्तम आकिंचन्य” की व्याख्या करते हुए कहा कि त्याग करने के पश्चात् त्याग के अहं का भी त्याग करना आकिंचन्य धर्म है। ‘मैं’ और ‘मेरा’ ये भी एक परिग्रह है। मोक्ष महल तक पहुंचने के लिए इसका त्याग आवश्यक है। इस संसार में हमारा कुछ भी नहीं है, यहां तक कि यह शरीर भी हमारा नहीं है। ऐसा विचार करते हुए हमें आकिंचन्य धर्म अंगीकार करना चाहिए। ज्ञानानंद स्वभावी आत्मा को छोड़कर किंचित मात्र भी पर-पदार्थ तथा पर के लक्ष्य से आत्मा में उत्पन्न होने वाले मोह-राग-द्वेष के भाव आत्मा के नहीं हैं- ऐसा जानना, मानना और ज्ञानानंद स्वभावी आत्मा के आश्रय से उनसे विरत होना, उन्हें छोड़ना ही उत्तम आकिंचन्य धर्म है। राग-द्वेष रूपी रसायन के माध्यम से यदि कर्मों का बंध होता है, संसार का निर्माण होता है; तो वीतराग भावरूपी रसायन के माध्यम से सारे के सारे कर्मों का विघटन भी संभव है।
आचार्य श्री ने कहा कि जो मुनि सर्व प्रकार के परिग्रहों से रहित होकर और सुख-दुःख के देने वाले कर्मजनित निज भावों को रोककर निर्द्वंदता से अर्थात निश्चिंतता से आचरण करता है, उसके आकिंचन्य धर्म होता है। अंदर-बाहर के समस्त परिग्रह से मुक्त होना ही सच्चे अर्थों में आकिंचन्य धर्म है। आकिंचन्य धर्म कहता है कि रिक्त हो जाओ। सहित से रहित हो जाओ, युक्त से मुक्त हो जाओ, सृजन से विसर्जन की ओर कदम बढ़ाओ ताकि आत्मा की निर्मलता का विकास हो। आकिंचन्य का अर्थ है – जो अपना नहीं है, जिसे अपना समझ रखा है उसे बिना खेद के त्याग देना। सभी के प्रति राग भाव से मुक्त होकर, एकाकी होकर, अपने वीतराग स्वरुप का चिंतन करना ही आकिंचन्य धर्म की उपलब्धि है। जो व्यक्ति अपने जन्म तथा मरण को ध्यान में रखते हैं तो मध्य का जीवन उनका सहज ही आकिंचन्य हो जाता है। आकिंचन्य साधक हर क्षण इस बोध में जीता है कि बाह्य पदार्थ मेरी आत्मा को ना जकड़ें। मेरा जन्म-मरण में नहीं, निर्वाण में परिवर्तित हो। मेरे संसार के समस्त बंधन समाप्त हो। यह उत्तम आकिंचन्य धर्म मर्यादा में प्रवेश कराये, ताकि हम पूर्ण आकिंचन्य हो सकें और परमात्म तत्व को उपलब्ध हो सकें। ऐसा चिंतन करना चाहिए कि मैं एक अकेला शाश्वत आत्मा हूं, जानना-देखना मेरा स्वभाव है, शेष जो भी भाव हैं वह सब बाहरी हैं तथा संयोग से उत्पन्न हुए हैं। शांति आत्मा के भीतर जाने में ही है। बाह्य परिधि में चक्कर लगाते रहने से शांति नहीं मिलती। मैं अकेला हूं, शुद्ध हूं, आत्मरूप हूं। मैं ज्ञानवान और दर्शनवान हूं। मैं रूप, रस, गंध और स्पर्श रूप नहीं हूं। सदा अरूपी हूं. कोई भी अन्य परद्रव्य परमाणु मात्र भी मेरा नहीं हैं। इस प्रकार की भावना जिसके हृदय घर में हमेशा भरी रहती है, ध्यान रखना उसका संसार का तट बिलकुल निकट आ चुका है।
आचार्य श्री ने आगे कहा कि संसार में कर्तत्व बुद्धि, भोक्तत्व बुद्धि और स्वामित्व बुद्धि, इन तीनों प्रकार की बुद्धियों के द्वारा ही संसारी प्राणी की बुद्धि समाप्त हो गयी है। वह बुद्धिमान होकर भी बुद्धू जैसा व्यवहार कर रहा है। अनन्तों बार जन्म-मरण की घटना घट चुकी है और अनन्तों बार जन्म-मरण के समय एकाकी ही इस जीव ने संसार की यात्रा की है। आज अपने को समझदार मानने वाला भी मंझधार में ही है। यह आत्म दृष्टि पाना एकदम संभव नहीं है। यह मात्र पढ़ने या सुनने से नहीं आती। इसे प्राप्त करने के लिए जो रत्नत्रय से युक्त हैं, जो वीतरागी हैं, जो तिल-तुष मात्र भी परिग्रह नहीं रखते, उनके पास जाकर बैठिये। पूछिए भी मत, मात्र पास जाकर बैठिये तो भी अपने आप ज्ञान हो जायेगा कि वास्तव में सुख तो अन्यत्र कहीं नहीं है। सुख तो अपने भीतर एकाकी में ही है।
