श्री महावीरजी। दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र श्री महावीर जी में विराजमान वात्सल्य वारिधि पंचम पट्टा धीश आचार्य श्री 108 वर्धमान सागर जी ने दशलक्षण धर्म के अंतर्गत आठवें दिन त्याग धर्म की विवेचना की। उन्होंने कहा कि आज दशलक्षण महापर्व का 8वां दिन है। आठ का अंक यह संदेश देता है कि हमें 8 कर्मों का नाश करना है। आठ का अंक त्याग की प्रेरणा देता है। त्याग हमें मोक्ष की ओर ले जाता है। आठ कर्मों को जब हम समाप्त करेंगे, आत्मा से पृथक करेंगे, तभी मोक्ष होगा। त्याग, चेतन और अचेतन, दोनों प्रकार का किया जाता है। चेतन में माता-पिता रिश्तेदार परिजन आते हैं और अचेतन में चल और अचल संपत्ति, नकद पैसा, जवाहरात, मकान, फैक्ट्री आदि आते हैं। चेतन-अचेतन से निवृत्ति का नाम ही त्याग है। स्थूल रूप से त्याग को हम दो भागों में बांट सकते हैं परिग्रह का त्याग और दान का त्याग। त्याग दान से संयत मुनिराजों-साधुओं को पिच्छी, कमंडल, शास्त्र दान, आहार दान, औषधि दान, अभय दान सभी दान शामिल हैं। राज कुमार सेठी, नरेश पाटनी, कैलाश पाटनी ने बताया कि आचार्य श्री ने अपने प्रवचन में प्राचीन तीर्थों की और प्राचीन मंदिरों की दुर्दशा पर चिंतित होकर समाज को यह संदेश दिया कि हमें प्राचीन तीर्थ, तीर्थों के संरक्षण की ओर भी ध्यान देना चाहिए। अनेक जगह दिगंबर जैन तीर्थ समाज के हाथ से निकलते जा रहे हैं। इसके लिए कहीं न कहीं हम लोगों की अनदेखी जिम्मेदार है। दान के स्वरूप को बताते हुए उन्होंने कहा कि धर्म की रक्षा के लिए, संस्कृति की रक्षा के लिए, तीर्थों के संरक्षण के लिए, नैतिक शिक्षा के लिए, जिन मंदिरों के लिए, राष्ट्र की रक्षा के लिए दान देना चाहिए। दान कभी भी स्वयं के नाम, यश और ख्याति के लिए नहीं होना चाहिए। ब्रह्मचारिणी साधना दीदी, पूनम दीदी एवमं राजेश पंचोलिया ने बताया कि
आचार्य श्री ने एक सरल उदाहरण के द्वारा बताया कि कुछ समय पूर्व मुजफ्फरनगर में एक व्यक्ति ने आचार्य श्री शांति सागर जी की पूर्व संस्कृति संरक्षण से प्रेरणा लेकर अपने पैतृक संपत्ति और स्व अर्जित संपत्ति परिजनों को दान नहीं दी और उस पैतृक और स्व अर्जित राशि से जिनवाणी के संरक्षण के लिए षट्खंडागम तथा धवल ग्रन्थ को स्वर्ण अक्षरों से ताम्रपत्र पर अंकित कर मंदिरों में दान दे दिया। आचार्य श्री ने बताया कि दान के पूर्व में भी काफी उदाहरण मिलते हैं। प्राचीन समय मे अगर हम देखें तो चामुंड राय ने दान देकर 57 फीट की बाहुबली स्वामी की प्रतिमा का निर्माण कराया। दीवान अमरचंद ने जिन मंदिरों का निर्माण कराया है, इससे भक्त पूजन कर जीवन को सफल बनाने का पुरुषार्थ करते हैं। श्रावकों को मंदिरों में बड़ी पूजा, बड़े विधान का आयोजन करना चाहिए, जिनवाणी का प्रकाशन कराना चाहिए। श्रावकों को जिनवाणी कम दाम में उपलब्ध हो सके, इसके लिए भी आप दान दे सकते हैं। दान के प्रकार में बताया कि आहार दान, ज्ञानदान, अभय दान, औषधि दान, कुल चार दान हैं। साधुओं के आहार दान में ये चारों दान समाहित हैं। आचार्य श्री ने कहा कि आप वृक्षों से सीख ले सकते हैं कि वृक्ष त्याग करके फलों को देता है, बीज त्याग करके पेड़ बनाता है, तब उस पेड़ पर फल लगते हैं, उनका दान देता है। समुद्र भी अपने पानी का संग्रहण नहीं करता है, उसे भी दान करता है। धूप में सागर का पानी भाप बनकर बादल का रूप लेता है और उससे वर्षा होती है, जिससे खेती होती है और उस पानी से सभी जीवों की पूर्ति होती है। गाय दूध देती है अर्थात दूध का स्वतः त्याग करती है। अगर गाय दूध का संचय करके रखे तो दूध नहीं निकलने पर गाय की मृत्यु भी हो सकती है। उन्होंने कहा कि धन के कारण भाई-भाई में संपत्ति के बंटवारे के लिए कलह, झगड़े होते हैं। पहले संयुक्त परिवार होते थे, जहां सामूहिक संपत्ति होती थी किंतु आज एकल परिवार देखने को मिल रहे हैं। त्याग धर्म के दिन आचार्य श्री ने संदेश दिया कि हमें मिथ्यात्व, अज्ञान का और असंयम का त्याग करना चाहिए। हम सभी धर्म में विकृति का त्याग करें। इससे हमें धर्म में आगे बढ़ने के लिए सहायता मिलेगी। क्रोध, मान, माया, लोभ, असंयम का त्याग करें, 24 प्रकार के परिग्रह का त्याग करें। दशलक्षण पर्व हमें यही संदेश देता है कि इस त्याग धर्म पर विचार कर स्वयं का विकास करने का पुरुषार्थ करें, तभी पर्युषण पर्व मनाना सार्थक होगा।
आचार्य श्री के प्रवचन के पूर्व श्री जी का पंचामृत अभिषेक, नित्य नियम, दशलक्षण पर्व की विशेष पूजा हुई। अभिषेक शांति धारा के पुण्यार्जक इंद्र सुरेश गोधा श्योपुर कला, मध्यप्रदेश रहे। आचार्य श्री के पंचामृत से चरण प्रक्षालन एवमं शास्त्र भेंट करने के पुण्यार्जक महावीर प्रसाद एवमं परिवार, बिजोलिया रहे। पूजन का मंत्रोचार 105 आर्यिका श्री महायशमति माताजी ने किया। पूजन में संगीत मय स्वर अजय पंचोलिया एवमं संगीता पाटोदी, सनावद ने दिए। दोपहर को तत्वार्थ सूत्र का वाचन किया गया।
