शिष्य की सम्यक श्रद्धा व दादागुरु के वात्सल्य का सुपारिणाम –
सम्मेदशिखर जी
शाश्वत तीर्थराज सम्मेद शिखर जी में विद्यमान मुनि श्री जयकीर्ति जी गुरुदेव विद्यमान है,जो वात्सल्य के साथ विनोदी स्वभाव के है हमेशा मुस्कुराता हुआ मुख मंडल जिनकी मुख्य पहचान है ऐसे गुरुदेव के शरीर में इसी अक्टूबर माह कोई रोग हुआ।
जिससे लगातार सही आहार भी नही लिया जा रहा था व अब तो आहार के बाद तुरंत वमन भी हो जाता,हमेशा खिला सा रहने वाला पूज्य मुनि श्री का मुख मंडल मुर्जा हुआ सा हो चला था,
विविध चिकित्सीय परामर्श व औषधियो के बाद भी राहत नहीं थी।स्वास्थ में गिरावट जारी था। अनेक प्रयत्न पर भी ठीक नहीं होने पर संघ के साधू व सेवारत ब्रह्मचारी चिंतित से थे। इसी बीच पुज्यवर वैज्ञानिक धर्माचार्य श्री कनक नंदी जी गुरूराज के भक्त शिष्य ब्रह्म समूह शिखर जी यात्रा हेतु वहा पहुंचे तब वे पूज्य मुनि श्री को देखकर हैरान हुए कि हमेशा प्रसन्न चित्त रहने वाले गुरुदेव अस्वस्थ दिख रहे है और उन्होंने भी कुछ उपाय परामर्श दिया तब संघस्थ साधु ने कहा की ये सब उपाय कर लिए गए है पर आराम नही हो रहा,इसलिए अब तो दादा गुरु आचार्य श्री कनकनंदी जी गुरूराज से सीधा संवाद ही बेहतर उपाय है।
तो संघस्थ ब्रह्म पल्लवी दीदी ने राजस्थान भिलुडा में श्रावक को फोन करके पूज्य आचार्य श्री को नमन करते हुए वस्तु स्थिति बतलाकर चर्चा करवाने को कहा।जिस पर पूज्य आचार्य श्री ने भी अपने पोते शिष्य को देखने के लिए स्वीकृति प्रदान की और वीडियो कॉल के माध्यम से मुनि श्री जयकीर्ति जी ने आचार्य श्री को आचार्य भक्ति पूर्वक नमोस्तु किया व पूज्य वैज्ञानिक धर्माचार्य श्री कनक नंदी जी गुरूराज ने आशीष स्वरूप उन्हें एक विशेष मंत्र श्रवण कराया व आवश्यक शुद्ध औषधि उपाय भी बतलाया।
किंतु औषधि उपाय से पूर्व ही आचार्य श्री के शुभाशीष से मुनि श्री एकदम स्वस्थ महसूस करने लगे,अगले दिन से आहार भी निर्विघ्न निरंतराय संपन्न होने लगे,मुनि श्री का मुख मंडल पुनः खिल उठा सम्पूर्ण रोग गायब सा हो चला।
और जब संध्या दीदी आदि ब्रह्म का समूह यात्रा पूर्ण कर वापस प्रस्थान करने लगे तब मुनि श्री ने कहा की दीदी आचार्य श्री को मेरा कोटि कोटि नमन करते हुए कहना की सभी ओषधियो व अनेक उपायों के बाद भी जो रोग ठीक नहीं हो रहा था वह पूज्य आचार्य श्री के एक मात्र मंत्र पूर्वक आशीष से ठीक हो गया जिसको मैं,पूरा संघ व आप सब प्रत्यक्ष अनुभव कर चुके है।
यह प्रसंग जब पूज्य आचार्य श्री को बताया गया तो उन्होंने कहा की ये कोई चमत्कार नही बल्कि भाव विज्ञान नुसार मेरे पोते शिष्य,श्री संघ ,आप सबकी गुरु के प्रति सम्यक श्रद्धा भाव व एक गुरु का शिष्य के प्रति वात्सल्य उदार भावो के परिणाम स्वरूप निकलने वाली सकारत्मक ऊर्जा का स्वाभाविक परिणाम है।
पूज्य आचार्य श्री वैज्ञानिक संत है जो प्रायः प्रत्येक विषय को विज्ञान व आगम सम्मत ही नजरिया रखते है,लेकिन जिसने यह सब देखा व अनुभव किया उनके लिए एक विशेष अतिशय ही था।
यहां तक कि उदयपुर के सुप्रसिद्ध आयुर्वेदाचार्य जो की सेवा भाव से अनेक संतो को अस्वस्थता पर औषधि उपलब्ध कराते है वे भी वर्षो पूर्व से पूज्य आचार्य श्री द्वारा प्रदत्त आरोग्य मंत्र आशीष को रिकार्डिंग कर पुरे ओषधालय में प्रवाहित करते है और उस औषधि से उपचार करते है।उनकी मान्यता है की तब से उनके मरीज शीघ्र स्वस्थ हो रहे है।
300 से अधिक संतो के शिक्षा गुरु, ब्राहा आडंबरों से पूर्णतया दूर,सादगी के श्रेष्ठ मिसाल अंतरंग तपस्वी,महाज्ञानी आचार्य श्री कनक नंदी जी गुरूराज के चरणो में अविनाशी नमन
शब्द सुमन -शाह मधोक जैन चितरी
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
