प्रथम पट्टाधीश आचार्य श्री वीर सागर जी के 66 वे समाधि दिवस पर परिचय ।ऐसे संत जिन्होंने दीक्षा के पूर्व गृहस्थ अवस्था मे चार रसों का त्याग किया था

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प्रथम पट्टाधीश आचार्य श्री वीर सागर जी के 66 वे समाधि दिवस पर परिचय ।ऐसे संत जिन्होंने दीक्षा के पूर्व गृहस्थ अवस्था मे चार रसों का त्याग किया था

भारतीय परंपरा में देव के बाद गुरु की भक्ति का स्थान आता है ऐसे महागुरु वीर साग़र महाराज का समाधि दिवस है पुज्य आचार्य भगवान का हम
आश्विन कृष्णा अमावस्या 25 सितम्बर 2022 को समाधि दिवस के अवसर पर परम पूज्य आचार्य श्री वीर सागर जी महाराज का स्मृति दिवस बना रहे है स्मृति दिवस के दिन गुरुओं को स्मरण किया जाता है।

परिचय

परम पूज्य आचार्य श्री वीर सागर जी महाराज ने महाराष्ट्र प्रांत के औरंगाबाद जिले में वीर ग्राम में हीरालाल जी गंगवाल के रूप में जन्म लिया पूर्णिमा को आपका जन्म हुआ एक तरह से उनकी जीवन की कथा पूर्णिमा से अमावस्या तक है। आपके जन्म के 45 दिन पश्चात जिन मंदिर में णमोकार मंत्र सुना कर 8 वर्ष की उम्र तक के लिए अष्ट मूलगुण पालन का नियम दिया गया।
धार्मिक पाठ शाला संचालन
सन 1917 में कचनेर अतिशय क्षेत्र में धार्मिक पाठ शाला का संचालन आपने प्रारम्भ किया। व आपने 7प्रतिमा का नियम सन 1921में नांद गांव में चातुर्मास कर रहे ऐलक श्री पन्ना लाल जी से प्रेरणा पाकर 7 प्रतिमा के नियम लिए 81 वर्ष के जीवन में वह बाल ब्रह्मचारी रहे।
ऐलक श्री पन्नालाल जी से उन्होंने ब्रह्मचर्य व्रत लिया आपके पिता का नाम रामसुख माता का नाम श्री
भागवत जैन था।

आपको चारित्र चक्रवती प्रथम आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज के प्रथम मुनि शिष्य बनने का सौभाग्य मिला और मुनिश्री वीर सागर जी कहलाए

81 वर्ष का संयमी जीवन रहा यह 12 वर्ष तक गुरु सानिध्य में रहे जीवन को अमृत तुल्य बनाया। आपकों बता दे 20वीं शताब्दी में चक्रवर्ती आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज ने मुनि धर्म का प्रवर्तन किया था

प्रथम शिष्य बनने बाद में वे आचार्य शिव सागर जी के रूप में प्रथम मुनि शिष्य बने

आचार्य जी ने 47 वर्ष की उम्र में
क्षुल्लक दीक्षा ली क्षुल्लक अवस्था। मे एक वर्ष रहे

आचार्य श्री शान्तिसागर जी आचार्य पदारोहण महोत्सव
समय डोली में हुआ उस दिन आचार्य श्री शान्तिसागर जी महाराज ने 3 मुनि दीक्षाएं दी मुनि श्री वीर सागर जी ऐलक श्री चंद्र सागर जी तथा मुनि श्री नेमी सागर जी की मुनि दीक्षा हुई है। आगे चलकर 79 वर्ष की उम्र में प्रथमाचार्य आचार्य श्री शांति सागर जी ने प्रथम पट्टाधीश धोषित किया
आपने गुरु आदेश के पालन में आचार्य पद ग्रहण किया।

लोकेषणा
आचार्य श्री वीर सागर जी लोकेषणा प्रचार प्रसार से बहुत दूर थे उन्होंने 28 दीक्षाएं दी जिसमे 10
मुनि दीक्षा

  • 1 मुनि श्री शिवसागर जी
  • 2 मुनि श्री धर्म सागर जी
  • 3 मुनि श्री पदम सागर जी
  • 4 मुनि श्री सन्मति सागर जी
  • 5 मुनि श्री आदि सागर जी
  • 6 मुनि श्री सुमति सागर जी
  • 7 मुनि श्री श्रुत सागर जी
  • 8 मुनि श्री अजीत कीर्ति जी
  • 9 मुनि श्री जय सागर जी
  • 10 मुनि श्री श्रुत सागर जी
  • के रूप में दी
  • 11 आर्यिका दीक्षा दी
  • 1 आर्यिका105 श्री इंदुमति माताजी
  • 2 आर्यिका 105 वीरमति माताजी
  • 3 आर्यिका 105 श्री विमलमति माताजी
  • 4 आर्यिका 105 श्री कुंथुमति माता
  • 5 आर्यिका 105 श्री सुमतमति
  • माताजी
  • 6 आर्यिका 105श्री पार्श्व मति जी
  • 7 आर्यिका 105 श्री सिद्धमति माताजी
  • 8 आर्यिका 105 श्री ज्ञानमति जी
  • 9 आर्यिका श्री सुपार्श्वमति माताजी
  • 10 आर्यिका 105श्री वासुमति माताजी
  • 11 आर्यिका 195 श्री शांतिमति माताजी रही।

साथ एक ऐलक दीक्षा व दो क्षुल्लक दीक्षाए दी
1 लश्री सिद्ध सागर जी
2 श्री सुमति सागर जी के रूप मेंदी
4 क्षुल्लिका दीक्षा दी
एवम कुल 28 साधु श्रमण बनाए अंतिम शिष्य के रूप में आचार्य कल्प श्री श्रुत सागर जी एवं अंतिम शिष्या आर्यिका श्री सुपार्श्वमति माताजी रही।
81 वर्ष की उम्र में जयपुर खनिया जी। में आश्विन कृष्ण अमावस्या सोमवार को आपकी समाधि हुई।
महत्वपूर्ण सूत्र
पुज्य आचार्य का एक सूत्र था समाज में संगठन का कार्य करो
विघटन कभी मत करो, एवम कहा सदा सुई का काम करो कैची का नही
संध में परस्पर संगठित रहगांठ लगाना मत भूलो।
अर्थात दीक्षा के परिणामों को याद रखो कि हमने क्यो दीक्षा ली है कही हम भटक कर ख्याति लाभ पूजा में तो नही लगे है।
तृण मत बनो पाषाण बनो
अर्थात दृढ़ता से अपने व्रतों का पालन करोजिनवाणी जिनागम के स्वाध्याय से असंख्यात कर्मो की निर्जरा होती है
स्वाध्याय चंचल मन को रोकने का महत्वपूर्ण उपाय है।
इन्होंने ब्रह्मचारी अवस्था मे धी नमक तेल और मीठे इन चार रसों का आजीवन त्याग कर दिया था
आचार्य श्री की पीठ में फोड़ा हो जाने पर डॉक्टर ने कहा कि इलाज के लिए दवाई सुधाना होगी आचार्य श्री ने कहा आप इलाज करो 1 धण्टे तक डॉक्टर इलाज करता रहा शारीरिक पीड़ा से अविचलित रह कर स्वाध्याय करते रहे शरीर और आत्मा की भिन्नता को जीवन मे उतारने का इससे बड़ा उदाहरण नही हो सकता है चारित्र चूड़ामणिआचार्य श्री वीर सागर जी के पुनीत पावन चरणों मे कोटिशः नमोस्तु इनके द्वारा दीक्षित शिष्य शिष्यों में

वर्तमान में आप की एक मात्र शिष्या आर्यिका श्री ज्ञान मति जी संयम मार्ग पर आसीन होकर आपका दीक्षा काल वर्तमान के सभी साधुओ में सर्वाधिक है।
राजेश पंचोलिया
वात्सलय वारिधि परिवार

संकलित अभिषेक जैन लुहाडिया रामगंजमडी

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