तप चिंतामणि रत्न है, इससे ही होगी मोक्ष प्राप्ति – आचार्य श्री वर्धमान सागर महाराज

JAIN SANT NEWS श्री महावीर जी

श्री महावीर जी। दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र श्री महावीर जी में विराजमान वात्सल्य वारिधि पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री 108 वर्धमान सागर जी ने दशलक्षण पर्व के सातवें दिन उत्तम तप धर्म की विवेचना की। आचार्य श्री ने बताया कि सभी संसारी जीवों की आत्मा कर्मों से बंधी है। यदि आप आत्मा को परमात्मा बनाना चाहते हैं तो आपको 12 प्रकार के तपों के माध्यम से आत्मा पर लगे हुए कर्मों को हटाना होगा, तब आपकी आत्मा शुद्ध होगी और आप परमात्मा बनने की राह पर चल सकेंगे। राजेश पंचोलिया ने बताया कि
आचार्य श्री ने लौकिक संसारी जीवों के लिए बहुत ही सरल शब्दों में बताया कि कच्चे आम का रंग हरा होता है। वह वृक्ष के ऊपर लगा होता है। उसका स्वाद खट्टापन का होता है, उसी आम को जब पकाया जाता है, तब उसका रंग पीला हो जाता है और उसका स्वाद मीठा होता है। इसी प्रकार तप के माध्यम से भी हम कर्मों का बंध करके पुण्य का आश्रव बढ़ा सकते हैं। जिस प्रकार स्वर्ण को 16 ताप देकर शुद्ध खरा सोना बनाया जाता है, उसी प्रकार आत्मा को भी 12 प्रकार के तप, 6 अंतरंग तप तथा 6 बहिरंग तप के माध्यम से शुद्ध बनाया जा सकता है। एक और उदाहरण में आचार्य श्री ने बताया कि कोयला के रंग काला होता है, जब इसे सिगड़ी पर जलाते हैं तो अग्नि के संपर्क से इसकी कालिमा दूर हो जाती है और राख बन जाता है जो कि सफेद होती है। इसी प्रकार आत्मा पर लगे हुए कर्मों को जब तप के माध्यम से अग्नि में जलाया जाता है, तब आत्मा विशुद्ध पावन हो जाती है। एक और उदाहरण में आचार्य श्री ने बताया कि पशुओं के दूध से दही बनाया जाता है। दही से मक्खन बनाया जाता है और मक्खन को जब अग्नि में तपाते हैं, तब हमें घी की प्राप्ति होती है। उसी प्रकार आत्मा पर लगे कर्मों को भी इसी प्रकार तपश्चरण के माध्यम से शुद्ध बनाते हैं। इसी प्रकार कुम्हार भी खदान से मिट्टी लाकर पानी मिलाकर उसके पिंड से चाक पर अलग-अलग बर्तन बनाता है, किंतु जब तक उन कच्चे बर्तन को अग्नि में पकाते हैं, तब उपयोग में लेते हैं। उसी प्रकार 12 तप से आत्मा पर लगे कर्मों को तपाया जाता है।
इसके पूर्व प्रातः भगवान का पंचामृत अभिषेक सभी नर-नारियों ने किया। आज के इंद्र बनने का सौभाग्य पंडित श्री महावीर प्रसाद जी, जोबनेर को प्राप्त हुआ। आचार्य श्री के चरण प्रक्षालन एवम शास्त्र भेंट करने के पुण्यार्जक राजमल जी श्रीपाल जी पंसारी भींडर बने।

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