सनावद। तप ही कर्म निर्जरा का साधन है। संयम से हमने इच्छाओं पर काबू करके उन पर नियंत्रण कर लिया। अब उन सीमित इच्छाओं के साथ भी फल प्राप्ति के लिये संयमित कर्म करते रहें। अब यदि इच्छायें पूर्णतः समाप्त हों, उत्पन्न ही न हों, तो यह तपस्या से ही यह संभव है। सन्मति जैन ने बताया कि उत्तम तप पर प्रकाश डालते हुुए ब्रह्मचारिणी सविता दीदी ने कहा कि तपस्या से हम इच्छाओं को खत्म करें तो कर्मों का क्षय होकर उनकी निर्जरा होगी। कर्मों के भोग के लिये आत्मा जन्म-मरण के असंख्य चक्रों में विचरण करती है और मुक्त यानि मोक्ष (वैकुण्ठ) को नहीं प्राप्त होती। इसलिये उत्तम तप से कर्म निर्जरा करके मोक्ष मार्ग पर अग्रसर हुआ जा सकता है। चार कषाय क्रोध, मान, माया, लोभ और पांच इंद्रियों की विषय लालसा को रोककर ध्यानमग्न होना ही उत्तम तप है।
