निर्यापक श्रमण मुनि श्री सुधासागर जी महाराज अपने संघ सहित जरुवाखेड़ा पहुंचे, हुई भव्य अगवानी..
. जरुवाखेड़ा
-जयोदय अतिशय क्षेत्र में विश्व कीर्तिमान स्थापित करने के उपरांत, आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य मुनि श्री सुधासागर जी महाराज अपने संघ सहित प्रातः कालीन बेला में जरूआखेड़ा पहुंचे। जहां पर उनकी ढोल धमाकों के साथ, धर्म ध्वजा लिए, श्रद्धालुओं ने भव्य अगवानी की, संपूर्ण नगर को दुल्हन जैसे सजाया गया था, अपने- अपने घर के समक्ष श्रद्धालुओं ने मुनि संघ के पाद-प्रक्षालन किया एवं मंगल आरती उतारी। मुनि संघ के साथ जयोदय अतिशय क्षेत्र के समस्त पदाधिकारी, श्रद्धालु एवं कार्यकर्ता चल रहे थे। मुनि संघ के साथ सैकड़ों ललितपुर के श्रद्धालु विहार करा रहे हैं। मुनि संघ का चातुर्मास ललितपुर में होना संभावित है। अशोक शाकाहार ने बताया कि मुनि संघ शुक्रवार को प्रातः कालीन बेला में खुरई नगर में प्रवेश करेगा। जरुआखेड़ा से आज गुरुवार संभवतः सायं कालीन बेला में मुनि संघ का विहार होगा। मुनि संघ की अगवानी करने वालों में राकेश जैन, सुकुमाल जैन, प्रदीप नायक, संजीव जैन, दिलीप नायक, दिनेश जैन ,संजय जैन, मुकेश जैन ,रवि जैन, अमन, नितिन ,डब्बू मोदी, मनोज, विक्की, अशोक शाकाहार, अरविंद जैन, अंकुर जैन एवं समाज के प्रमुख देवेंद्र सेठ, ऋषभ जैन, वीरेंद्र जैन आदि प्रमुख थे।
रोटी कपड़ा और मकान हमारी आवश्यकता में से एक हैं- मुनि श्री सुधासागर. जी ––

अल्प प्रवास पर आए मुनि श्री सुधासागर जी महाराज ने गुरुवार को विशाल धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि प्रायः लोग पूछते हैं कि पहले जीवन जीने के साधन जुटा लें फिर मौज करेंगे। जी- तोड़ तैयारियां जीवन पर्यंत करते हैं और मात्र साधनों को जुटाने में ही इस बहुमूल्य जीवन को खो देते हैं। आश्चर्य तो यह है कि हमने व्यर्थ के साथ इतना संबंध जोड़ लिया है कि सार-असार ,अर्थ- अनर्थ और सार्थक- निरर्थक को छांटना ही मुश्किल हो गया है। साधारणतया रोटी, कपड़ा और मकान हमारी प्रमुख आवश्यकताएं हैं। उन्हें ही जुटाते-जुटाते जिंदगी की शाम हो जाती है।
मुनि श्री ने कहा कि आदमी चाहता है कि आज धन इकट्ठा कर लूं और कल जी लूंगा। आज मकान बना लूं,कल आनंद से रहूंगा, किंतु कल कभी आता नहीं। धन इकट्ठा करते- करते एवं मकान बनाते -बनाते जिंदगी ढल जाती है। इस दुनिया में सुविधाएं तो एकत्रित हो सकती है, पर इंसान को जीने की कला नहीं आती। एक प्रश्न चिंतन करने योग्य है कि मनुष्य उम्र भर जो आपाधापी कर रहा है, वह जीने के लिए कर रहा है या करने के लिए जी रहा है।मुनिश्री ने कहा कि यदि वह जीने के लिए कर रहा है, तो उतना ही करना पर्याप्त है, जितने से जीया जा सके। ज्यादा क्यों करें। ज्ञानीजन कहते हैं कि अजगर अपनी जगह पड़ा रहता है, तो भी उसे भोजन मिल जाता है। पंछी भी नौकरी- चाकरी करने नहीं जाते, फिर भी चुगने को दाने मिल जाते हैं। जीते तो पशु-पक्षी भी हैं, पर साधन नहीं जुटाते, सिर्फ व्यक्ति ही जीता तो कम है, मगर साधन अनेक पीढियों तक चले, इतने जुटा लेता है। मुनि श्री ने कहा कि इस आपाधापी से फुर्सत मिले, तो मनुष्य जीने का अर्थ समझे। सम्राट सिकंदर का विश्व-विजेता बनने का सपना भी अधूरा रह गया, पूरा नहीं हुआ वह भी खाली हाथ चल बसा।इस संसार में किसी की भी यात्रा पूरी नहीं हुई। सभी को अधूरे में ही जाना पड़ता है और सिकंदर यूनान नहीं पहुंच सका। इस बात का हमें ध्यान रखना चाहिए।वास्तव में जीवन सार्थक तब होगा, जब हम आत्म- साधक बनकर, व्यर्थ के आडंबरों से बचकर जीवन के महत्त्व को समझेंगे और सही दिशा में कदम बढ़ाएंगे, तभी जीवन का संपूर्ण सौंदर्य खिल सकता है। इस संसार में आत्मा ही सार है, वही जानने व पाने योग्य है। शरीर और इसके संपूर्ण नाते- रिश्ते सत्य नहीं है।यह शरीर शमशान में राख बनने वाला है। आत्मा जब तक परमात्मा नहीं बनता, तब तक उसी लक्ष्य की ओर पुरुषार्थ करते रहना हमारा कर्तव्य है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाडीया रामगंजमडी
