इंदौर@राजेश जैन दद्दू । जीवन में स्वतंत्रता आवश्यक है, स्वच्छंदता नहीं। मन, वचन, काय के विपरीत प्रवृत्ति स्वच्छंदता है और मन- वचन-काय की संयम के साथ प्रवृत्ति स्वतंत्रता है। स्वच्छंद प्रवृत्ति से मुक्त होने के लिए अपने मन को एकाग्र कर इंद्रियों को वश में करना चाहिए। स्वच्छंद प्रवृत्ति आत्मा की स्वतंत्रता में बाधक है। मन, वचन और काय का पाप योग से युक्त होना ही स्वच्छंद प्रवृत्ति है। इस प्रवृत्ति से कर्मों के योग जुड़ते हैं और विभिन्न प्रकार के शारीरिक और मानसिक रोग उत्पन्न होते हैं।
उक्त उदगार श्रुत संवेगी मुनि श्री आदित्य सागर जी महाराज ने शुक्रवार को समोसरण मंदिर, कंचन बाग में प्रवचन देते हुए व्यक्त किए। मुनि श्री ने मन की संकलेषता से उत्पन्न विसंगतियों की भी चर्चा की और कहा कि संकलेषता युक्त मनसाः नरकेश्वरा और संकलेषता मुक्त मनसाः परमेश्वरा। अपने मन को संकलेष रहित बनाएं और जीवन में सुख- शांति का अनुभव करें। संकलेषता युक्त मन से अवरोध और दुख उत्पन्न होते हैं, आयु क्षीण होती है एवं अकाल मरण भी हो सकता है।
प्रचार संयोजक राजेश जैन दद्दू ने बताया कि समोसरण मंदिर, कंचन बाग में आगामी माह मुनि श्री आदित्य सागर जी महाराज के ससंघ सान्निध्य में भव्य एवं विशाल जिन बिंब पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव होगा जिसमें विश्व की सबसे बड़ी 4 फुट 3 इंच ऊंची भगवान शांतिनाथ की स्फटिक मणि की प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा होकर जिनालय की नवीन वेदी में विराजमान की जाएगी। प्रतिष्ठा महोत्सव के पात्रों का चयन रविवार 2 अक्टूबर को मुनि संघ के सान्निध्य में समोसरण मंदिर
कंचन बाग में होगा । सभा में पंडित रतन लाल जी शास्त्री, डॉक्टर जैनेंद्र जैन, अशोक खासगीवाला, आजाद जैन, राजेंद्र सोनी एवं देवेंद्र पाटनी आदि समाज के लोग उपस्थित थे। धर्म सभा का संचालन अजीत जैन ने किया।
