इंदौर। व्यक्ति हमेशा जवान नहीं रहता। समय आने पर वृद्ध होता ही है लेकिन इच्छाएं कभी पूरी नहीं होतीं और हर समय जवान रहती हैं। इच्छाएं ही मनुष्य के जीवन में दुख का कारण बनती हैं। स्वयं दुखी होना श्रेष्ठ है लेकिन इच्छाएं प्रकट करके हर समय दुखी रहना श्रेष्ठ नहीं है। यह उद्गार बुधवार को चिन्मय सदन कंचन बाग में श्रुत संवेगी मुनि श्री आदित्य सागर जी महाराज ने इच्छाएं दुख का कारण विषय पर प्रवचन देते हुए व्यक्त किए। मुनि श्री ने कहा कि यदि आनंद, सुख शांति के साथ संकलेषता रहित जीवन जीना चाहते हो तो अहंकार, मायाचार और अपनी अनावश्यक इच्छाओं पर अंकुश लगाकर धैर्य के साथ धर्ममय जीवन जीने का प्रयास करो। अपनी इच्छाओं को पूर्ण रूप से दमित करने पर ही आपकी जीत होगी। यह स्मरण रखो कि जीत के लिए इच्छाएं नहीं, लक्ष्य होना चाहिए।
