इंदौर। परिग्रह हलाहल विष है, उसमें शांति नहीं है। जिस परिग्रह को तुम तुम्हारा मान रहे हो, वह तुम्हारा है ही नहीं। जितने संबंध व्यक्ति और वस्तु से बना रहे हो और उन्हें अपना मान रहे हो, वे सब दुख का कारण हैं। आकिंचन्य धर्म का पालन करना है तो पर द्रव्य और परिग्रह के प्रति ममत्व को छोड़ना पड़ेगा। परिग्रहण आकिंचन्य धर्म में बाधक है। यह उद्गार पर्युषण पर्व के 9वें दिन उत्तम आकिंचन्य धर्म पर समोसारण मंदिर, कंचन बाग में प्रवचन देते हुए श्रुत संवेगी मुनि श्री आदित्य सागर जी महाराज ने व्यक्त किए। मुनि श्री ने कहा कि जन्म माता पिता ने दिया, नाम किसी और ने, शिक्षा किसी और ने दी एवं यह शरीर भी तुम्हारा नहीं है फिर तुम राग किस पर करते होॽ जो तुम्हारा आत्म तत्व है, वही सिर्फ तुम्हारा है और तुम उसे अपना ना मानकर पर द्रव्य को अपना मान रहे हो। तिल तुश मात्र भी परिग्रह ना होना ही आकिंचन्य धर्म है, जो सही अर्थों में मुनि धारण करते हैं। श्रावकों को भी आकिंचन्य होने का प्रयास करना चाहिए। इस अवसर पर पंडित रतन लाल जी शास्त्री एवं मुनि श्री अप्रमित सागर जी, मुनि श्री सहज सागर जी महाराज भी उपस्थित थे। धर्म सभा का संचालन हंसमुख गांधी ने किया।
