परिग्रह बाधक है आकिंचन्य धर्म में – मुनि श्री आदित्य सागर जी महाराज
इंदौर। परिग्रह हलाहल विष है, उसमें शांति नहीं है। जिस परिग्रह को तुम तुम्हारा मान रहे हो, वह तुम्हारा है ही नहीं। जितने संबंध व्यक्ति और वस्तु से बना रहे हो और उन्हें अपना मान रहे हो, वे सब दुख का कारण हैं। आकिंचन्य धर्म का पालन करना है तो पर द्रव्य और परिग्रह के प्रति […]
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