लेना-देना त्याग नहीं, छोड़ना त्याग है – मुनि आदित्य सागर जी

JAIN SANT NEWS इंदौर

इंदौर। पर्युषण पर्व के आठवें दिन समोसरण मंदिर, कंचनबाग में उत्तम त्याग धर्म पर प्रवचन देते हुए मुनि श्री आदित्य सागर जी महाराज ने जीवन में दान और त्याग का महत्व बताते हुए कहा कि जब तक त्याग नहीं, तब तक मोक्ष मार्ग प्रारंभ नहीं। त्याग और दान में अंतर बताते हुए मुनि श्री ने कहा कि लेना देना त्याग नहीं, छोड़ना त्याग है। दान प्रिय वस्तु का होता है। त्याग प्रिय व अप्रिय, दोनों वस्तुओं का होता है। योग्य पात्र को देखकर निर्ममत्व भाव
से विनय पूर्वक औषधि, शास्त्र, अभय और आहार इन चार प्रकार का दान करना त्याग धर्म है। मुनि श्री ने आगे कहा कि आनंद और शांति त्याग में है, ग्रहण में नहीं। त्याग करवाया नहीं जाता, किया जाता है। प्रत्येक श्रावक को मान-कषाय से रहित होकर योग्य पात्र को दान देना चाहिए एवं राग, द्वेष, कषाय और व्यसन आदि का भी त्याग करना चाहिए।
इस अवसर पर पिछले 50 वर्षों से पंडित जयसेन जी के प्रधान संपादकत्व में प्रकाशित महावीर ट्रस्ट की पत्रिका सन्मति वाणी मासिक का विमोचन पत्रिका की सह संपादक डॉक्टर सुशीला सालगिया एवं संपादक मंडल के सदस्य डॉक्टर जैनेंद्र जैन, संजीव जैन संजीवनी ने श्री आजाद जैन, हंसमुख गांधी, अरुण सेठी एवं अशोक खासगीवाला से करवाया और मुनि श्री आदित्यसागरजी महाराज ससंघ को पत्रिका भेंट की।

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