भीतरी कुभावनाओं को त्यागकर शुद्धता का प्रयत्न करना ही उत्तम शौच धर्म

JAIN SANT NEWS महरौनी

महरौनी (ललितपुर)। दशलक्षण पर्व पर जैन मंदिरों में धर्म गंगा बह रही है। प्रातकाल से ही भक्तों की भीड़ मंदिरों में उमड़ रही है। जिन अभिषेक पूजन और दशलक्षण पूजन के साथ श्रावक भगवान जिनेन्द्र की आराधना में लीन हैं। श्री अजित नाथ दिगम्बर जैन बडा मंदिर में प्रात कालीन बेला में जिन अभिषेक पूजन किया गया और शांति धारा कर विश्व शांति और रोग मुक्त, आपदा मुक्त संसार की कामना की गई। सांगानेर से आये विद्वान अंकित भैया ने धर्म सभा को संबोधित करते हुए कहा कि जिस प्रकार हजारों मन साबुन लगाकर कोयले को धुलवाया जाए तो भी वह कोयला कभी भी अपने कालेपन को छोड़कर सफेदपन को प्राप्त नहीं कर सकता, उसी तरह यह शरीर भी दुनिया भर के साबुन, तेल, चंदन आदि से कभी भी सुगंधित अर्थात् पवित्र नहीं हो सकता। यह शरीर सदा अमंगल ही रहता है। इसीलिए ज्ञानी महान् महात्मा मुनियों ने शरीर को शुचि न मानकर इस अमंगलमय शरीर में स्थित मंगलमय शुद्ध आत्म-तत्व को ही शुचि माना है। अनादि काल से आत्मा के साथ लगे हुए क्रोध, मान, माया, लोभ इत्यादि तथा इंद्रिय जन्य दुष्ट वासनाओं को बढ़ाने वाले विषय भोग रूपी विष को वैराग्य या ज्ञान रूपी पानी से आत्मा के ऊपर लगे हुए कर्म मल को बार-बार धोना चाहिए और भीतरी कुभावनाओं को त्यागकर शुद्धता का प्रयत्न करना ही उत्तम शौच धर्म है।

सांध्य कालीन बेला मे संगीतमय आरती की गई। सांस्कृतिक कार्यक्रम के अन्तर्गत अखिल भारतीय महिला परिषद की सदस्यों ने भगवान नेमीनाथ के विवाह एवं भगवान और राजुल के वैराग्य पर आधारित नाटय मंचन किया। नाटक के माध्यम से 22वें तीर्थंकर यदुवंशी नेमिनाथ तीर्थंकर का जीवन चरित्र को दिखाया गया। इसमें बताया गया कि शौरीपुर के समुद्र विजय राजा के यहां माता शिवादेवी की कुक्षी से श्रावण सुदी 5 को तीर्थंकर का जन्म हुआ। माता ने 14 स्वप्न देखे, इंद्रकृत जन्मोत्सव पूर्ववत हुआ। श्रीकृष्णजी के पिता वासुदेवजी एवं समुद्र विजय राजा दोनों सगे भाई होने नेमिनाथजी एवं श्रीकृष्णजी चचेरे भाई थे। भगवान नेमिनाथजी का विवाह उग्रसेन राजा की पुत्री राजुल देवी के साथ होने वाला था, परंतु विवाह भोज में एकत्र पशु हिंसा की जानकारी होने पर पशुओं को बंधनमुक्त कराकर रैवतगिरी (गिरनार तीर्थ) पर दीक्षा ग्रहण कर ली।

नव-नव भवों में नेम-राजुल की प्रेम कहानी दाम्पत्य जीवन जीती रही। राजुल का परित्याग कर जाने लगे तो राजकुमारी राजुल ने भी पीछे-पीछे गिरनार जाकर दीक्षा ग्रहण कर आत्म साधना कर मोक्ष प्राप्त किया।

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