सनावद। सहनशीलता क्रोध को पैदा न होने देना। क्रोध पैदा हो ही जाए तो अपने विवेक से, नम्रता से उसे विफल कर देना। अपने भीतर क्रोध का कारण ढूंढना, क्रोध से होने वाले अनर्थों को सोचना, दूसरों की बेसमझी का ख्याल न करना। क्षमा के गुणों का चिंतन करना ही उत्तम क्षमा कहलाता है। ये प्रवचन आचार्य श्री 108 योगीन्द्रसागर जी महाराज की संगस्ता सविता दीदी ने पर्वाधिराज पर्युषण पर्व के प्रथम दिन दिए।
प्रवक्ता सन्मति जैन काका ने बताया कि पर्युषण पर्व के प्रथम दिन उत्तम क्षमा के दिन श्री दिगम्बर जैन बड़ा मंदिर जी में पंचामृत अभिषेक किया गया। शांति धारा व सामूहिक पूजन भी हुआ। महिमा जैन के द्वारा मंगलाचरण किया गया व आचार्य भगवान के चित्र के समकक्ष सविता दीदी व मीना जटाले के द्वारा दीप प्रज्ज्वलन किया गया। दीदी ने उत्तम क्षमा धर्म का महत्व समझाते हुए अपनी वाणी से सभी को रस पान करवाया। वहीं दोपहर में तत्वार्थसूत्र की कक्षा दीदी ने ली एवं शाम को आनंद की यात्रा प्रश्न मंच किया गया। बड़ी भक्ति भाव से सभी समाजजनों ने मिलकर जिनेंद्रदेव की आरती-भक्ति की। इस अवसर पर सभी समाजजन उपस्थित रहे।
