कार्य के पहले विचार करो कि कार्य करने योग्य है या नहीं – आदित्य सागर जी

JAIN SANT NEWS इंदौर

इंदौर। जो कार्य आत्मा का उपकार करता है, वह देह का अपकार करता है और जो कार्य देह का अपकार करता है, वही कार्य आत्मा का उपकार करता है। इसलिए कार्य करते समय विचार करना कि जो कर रहे हो, वह करने योग्य है या नहीं। यह उद्गार मुनि श्री आदित्य सागर जी महाराज ने रविवार को समोसरण मंदिर, कंचन बाग मे धर्मसभा में व्यक्त किए।
मुनि श्री ने कहा कि शरीर को भोगों से पुष्ट मत करो, भोगों में लगे रहना अकार्य है। किसी असहाय गरीब को मदद की आवश्यकता होने पर
मदद ना करना देह के लिए अपकारी है लेकिन आत्मा के लिए उपकारी है। दान, संयम, तप, सेवा, धैर्य करने योग्य कार्य एवं भोग, संग्रह, क्रोध, कषाय, कृपणता और असंयम नहीं करने योग्य कार्य हैं। जीव के प्रति गलत भाव किए तो कर्म नहीं छोड़ेंगे। जैसा कार्य करोगे वैसा फल मिलेगा। उन्होंने कहा कि
18 पुराण, चार वेद में बात मिली है दो, सुख देत सुख होत है, दुख देत दुख होत‌।
धर्म सभा में क्षुल्लक श्री विनयनंदी जी महाराज आजाद जैन और टी के वेद ने भी विचार व्यक्त किए। इस अवसर पर श्रुत संवर्धिनी महासभा इंदौर संभाग के नव निर्वाचित अध्यक्ष डी के जैन एवं महामंत्री रजनीकांत गांधी सहित सभी पदाधिकारियों को शपथ अधिकारी हंसमुख गांधी ने पद एवं कर्तव्यनिष्ठा की शपथ दिलाई। मुख्य अतिथि इनकम टैक्स कमिश्नर पी के सिंघई थे। सभा में अनिल रावत अशोक खासगीवाला, कीर्ति पांड्या, मुकेश टोंगिया, डॉक्टर जैनेंद्र जैन एवं काफी संख्या में समाज जन उपस्थित थे।

Comments (0)

Your email address will not be published. Required fields are marked *