नैतिकता के साथ जीवन यापन करना सद ग्रहस्थ की पहचान आचार्य विनीत सागर
कामा
भाद्र माह संयम साधना के साथ साथ व्रत उपवास आदि धारण कर आत्म विशुद्धि का पवित्र माह है। प्रथम दिवस से ही सोलहकारण भावनाओं का पालन प्रारम्भ हो जाता है । तीर्थंकरत्व की कारणभूत सोलह भावनाओं में सर्व प्रथम व सर्व प्रधान भावना दर्शनविशुद्धि है। इसके बिना शेष पन्द्रह भावनाएँ निरर्थक हैं। क्योंकि दर्शनविशुद्धि ही आत्मस्वरूप संवेदन के प्रति एक मात्र कारण है। सम्यग्दर्शन का अत्यंत निर्मल व दृढ हो जाना ही दर्शनविशुद्धि है। उक्त प्रवचन विजयमती त्यागी आश्रम कामां में गुरु भक्ति के दौरान आचार्य विनीत सागर महाराज ने व्यक्त किये।
आचार्य ने कहा कि सोलह भावना ही तीर्थंकर प्रकृति के बंध का कारण है जब तक इन भावनाओं को नहीं भाया जाता तब तक तीर्थंकर प्रकृति का बंध नहीं हो सकता है। उन्होंने कहा कि प्रथम भावना दर्शन विशुद्धि भावना सबसे महत्वपूर्ण है इसके बिना पन्द्रह अन्य भावनाएं नहीं भाई जा सकती हैं। सम्यक दर्शन का अत्यंत निर्मल व दृढ़ होना, 25 दोषों से मुक्त विशुद्ध सम्यक दर्शन को धारण करना दर्शन विशुद्धि भावना कहलाता है। आचार्य ने कहा कि सोलह कारण भावना वैसे तो संतो का विषय है किंतु श्रावकों को भी अपने जीवन मे संयम का यथा योग्य पालन अवश्य करते रहना चाहिए। नियमों के साथ नैतिकता पूर्ण जीवन यापन करना सद ग्रहस्थ की पहचान है। आचार्य संघ में विराजमान मुनि अजित सागर महाराज ने कहा कि संतों के सानिध्य में संयम का पालन बड़ी आसानी के साथ किया जा सकता है क्योंकि संत हर समय श्रावक के लिए प्रेरणा स्वरूप होते हैं और उनके कल्याणार्थ अपनी वाणी के माध्यम से जिनवाणी का सार बताते रहते हैं। अतः जितना हो सके उतना संत सानिध्य अवश्य करना चाहिए।
जैन समाज मनाएगा स्वतंत्रता दिवस
वर्षायोग समिति द्वारा
आचार्य संघ के सानिध्य में आजादी की 75 वीं वर्षगांठ अमृत महोत्सव झंडारोहण व सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ विजय मती त्यागी आश्रम कामां में मनाया जाएगा। इस अवसर पर जैन समाज द्वारा तिरंगा सेल्फी कॉर्नर की स्थापना भी की जाएगी।
संकलन अभिषेक जैन लुहाडीया रामगंजमडी
