विद्याधर से विद्यासागर

*☀विद्यागुरू समाचार☀* विद्याधर से विद्यासागर

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चलेमल्लप्पाजीदर्शनार्थ🤗-

अभी सत्रह दिन ही बीते थे कि मल्लप्पाजी सपरिवार तैयार हो गये। अजमेर जाने अपने युवा मुनि के चरणों में अपनी पूजा के पुष्प चढ़ाने । कहने लगे श्री जी से कुछ रख लेना उनके चरणों में चढ़ाने। श्री जी ने सुनकर जी कह दिया। अपने निर्णय को स्पष्ट नहीं किया कि क्या रख रही हैं। परिवार के साथ उनका वह सेवक भी था, जिसका नाम मारुति था, विद्या के बालकाल का सखा। वह जैन न था तो क्या, जैनों के साथ बचपन से रहकर जैनत्व का बोध हो चुका था। वह जैनत्व जानता था और जैनत्व स्वीकारे हुए भी था। मल्लप्पाजी के परिवार के किसी भी सदस्य से कम नहीं था वह वे सब चल पड़े।

दीर्घ यात्रा पूरी हो गई। मल्लप्पाजी सपरिवार अजमेर पहुँच गये। आचार्यश्री के दर्शन विद्यासागर के दर्शन दर्शनों से मन का पागलपन संभलता गया, बातें न हो सकी, संकेत न किए जा सके, किए सिर्फ दर्शन। दर्शन से रोज आँखें तृप्त कर लेते। मन भर लेते।

मल्लप्पाजी ने र महाराज को सम्पूर्ण परिवार का परिचय दिया यह विद्या की माँ है, श्रीमंती जी, अब नहीं रोती। यह विद्या से छोटा भाई है अनन्तनाथ, आजकल इसकी चंचलता समाप्त हो गई है। यह उससे छोटा है-शांतिनाथ पहले से ही शांत स्वभाव था, अब तो मौन सा ले रखा है।

यह शान्ता है, बीस दिन से पीछे पड़ी थी अजमेर आने के लिए अब दर्शन करने में हिचकिचाती है। यह सुवर्णा है, कहती है भैया बोलते नहीं। और यह…मारुति है, विद्या का मित्र है बचपन का अपने यहाँ ही कार्य करता है। अचानक बोल पड़े ज्ञानसागर- अरे मारुति तुम कैसे मित्र हो, मुस्काए ज्ञानसागर फिर आगे बोले, देखो, तुम्हारा एक मित्र मुनि बन गया और तुम गृह जंजाल में फँसकर रह गए।

पोस्ट-100…शेषआगे…!!!

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