विद्याधर से विद्यासागर

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वापसहोगयेबड़ेभैया :

बाबू महावीर प्रसाद स्वगृह को लौट पड़ते हैं। भाई विद्याधर को
अजमेर में छोड़ते हैं, मुनि विद्यासागर को हृदय में समा लेते हैं और चल देते हैं सदलगा, जहाँ का हर प्राण विद्याधर की कहानी सुनने लालायित है। जहाँ का हर मस्तिष्क विद्या की चर्चा के लिए प्रतीक्षातुर है।

अनन्तनाथ और शांतिनाथ शाला से लौट रहे हैं। वे देखते हैं उनके दरवाजे पर भीड़ लगी हुई है। किसी अशुभ प्रसंग की कल्पना से भयभीत हो जाते हैं। दोनों दौड़ पड़ते हैं तब तक उन्हें अजमेर से लौटे अग्रज महावीर दिख जाते हैं। दोनों बालकों का अदृश्य विषाद जाता रहता है और हर्षातिरेक से उछलने लगते हैं। उन्हें विश्वास हो जाता है कि महावीर विद्या को वापस ले आए हैं। मगर अगले ही क्षण उनका मीठा-मीठा विश्वास ध्वस्त हो जाता है, जब देखते हैं कि बड़े भाईसाब विद्या को नहीं, उनकी तस्वीर को लाए हैं। दोनों अनुज ठगे से रह जाते हैं। फिर भीड़ में शामिल हो चित्र देखने लगते हैं।

महावीर बाबू वह सब कुछ वर्णित करते हैं जो उन्होंने अजमेर देखा था। पिता, माता, भाई और बहिनें साँस साधे महावीर की बातें सुन रहे हैं। सुनते चले जा रहे हैं। महावीर बतलाते चले जा रहे हैं। दीक्षा महोत्सव के कुछ चित्र निकालते हैं बैग से और बतलाते हैं केशलोंच का चित्र है यह यह वस्त्र त्यागते समय का है। यह ज्ञानसागरजी का है दीक्षा दे रहे हैं।

चित्र देखते हुए, महावीर बाबू को सुनते हुए, सभी की आँखों से अश्रुधारा बहती रहती है। नासाएं सिर सिर्र हो रही हैं। रूमाल कभी आँखों पर तो कभी नासिका पर घूमते हैं चर्चा चल रही है।

सम्पूर्ण ग्रामवासियों को पता चल गया महावीर के लौटने का। नागरिकों के झुण्ड के झुण्ड चले आ रहे हैं महावीर के निवास पर घर भर गया है लोगों से घर घिर गया है श्रोताओं से विद्या के चहेतों से महावीर सब को बता रहे हैं। प्रश्नों के उत्तर दे रहे हैं। चर्चा का क्रम नहीं टूटता। एक दिन, दो दिन पन्द्रह दिन बीत गए। घर पर रोज-रोज भीड़ जमती महावीर रोज-रोज संबोधित करते हैं।

मल्लप्पाजी और श्रीमती जी सारे नगर में पूजित हो गए। जो व्यक्ति चर्चा सुनकर लौटने लगता, अपना सिर उनके चरणों पर धर देता। विद्या का पूरा घर मंदिर की तरह वंदनीय हो गया। नागरिकों के लिए। वहाँ रास्ते से जो भी निकलता उसके हाथ जुड़ जाते विद्या के निवास को देखकर।

पोस्ट-99…शेषआगे…!!!

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