विद्याधर से विद्यासागर

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कसौटीबनीपरिणाम :

ब्रह्मचारी हुए अभी कुछ ही माह बीते थे किन्तु उन्हें कसौटियों की चुनौतियों से होकर नित-नित निकलना पड़ रहा था। एक दिन पारस पारखी, गुरुवर ज्ञानसागरजी महाराज ने चुपके से अपनी पिच्छिका के पंख बिखेर दिये और फिर सहज होकर बोले- विद्याधर इस पिच्छिका को पुनः बना सकते हो ?

-जी गुरुवर

-कैसे? पहले कभी बनाई है ?

-नहीं, पर देखता रहा हूँ।

  • तो क्या देखने भर से बना डालोगे?

-जी।

-अच्छा बनाओ।

प्रखर बुद्धि वाले विद्याधर जी ने शास्त्रों में वर्णित विद्याधरों की तरह आनन-फानन पिच्छिका बना डाली। पहले से अधिक गसी गसी और अधिक सुडौल / सुन्दर / हल्की ले जाकर गुरु चरणों के निकट रख दी। गुरुजी ने पिच्छिका उठाकर देखी तो काफी देर देखते रहे, जैसे कोई नई वस्तु पहली बार देख रहे हों। फिर विचार करने लगे कुछ। विचार करते हुए ओंठ हिलाये ब्रह्मचारीजी, आप समझदार हो चुके हैं।

तपपूर्ण, संयमपूर्ण और सेवापूर्ण हो चुका है आपका अनुभव सही में अब पिच्छिका लेने योग्य हो गये हैं आप। विद्याधर काष्ठवत् मौन रह गये। कुछ न समझ सके। गुरुवाणी सुनते रहे, बस उन्हें उस समय नहीं समझ में आया कि गुरुवाणी में उन्हें आगे बढ़ाने का संकेत किया गया है।

पोस्ट-80…शेष आगे…!!

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