त्याग ही प्राप्ति का मार्गः भावलिंगी संत आचार्य श्री 108 विमर्शसागर जी महाराज

JAIN SANT NEWS

मूर्छा में जीने वाले कभी मोक्ष को उपलब्ध नहीं होते
मूर्छा का अर्थ है भीतर के प्रेम का अनुभव नहीं होना

भावलिंगी संत आचार्य श्री 108 विमर्शसागर जी महाराज ने भक्तजनों को दिए अपने सम्बोधन में कहा है कि किसी ने पूछा, प्राप्ति का मार्ग क्या है। मैंने कहा कि त्याग ही प्राप्ति का मार्ग है। बिना त्याग के वस्तु की प्राप्ति नहीं हो सकती। जब छोड़ना ही है, त्यागना ही है तो दानपूर्वक छोड़ो। जो हमारे पास है, उसे अवश्य ही छोड़ना पड़ेगा। जब छोड़ना आवश्यक है तो समझदारी इसी में है कि दानपूर्वक छोड़ा जाए। जो दान किया जाता है, वो बहुत अधिक मात्रा में पुनः प्राप्त हो जाता है। जबकि जो हमारे पास है, अगर उसमें ही मूर्छा बनी रही तो वह मूर्छा हमारी दुर्गति का कारण बन जाती है। मूर्छा में जीने वाले कभी मोक्ष को उपलब्ध नहीं होते। शाश्वत सुख की किरणें उनके जीवन में कभी नहीं फूटती। जो मूर्छा को छोड़कर चेतना के जागरण में निरत हैं, वे शीघ्र ही मुक्ति रमा को अपनी जीवन संगिनी बना लेते हैं।
भावलिंगी संत आचार्य श्री 108 विमर्शसागर जी महाराज ने यह भी बताया कि मूर्छा का अर्थ है- स्वयं से अपरिचित होना। मूर्छा का अर्थ है अपनी निजी संपत्ति से बेखबर होना। मूर्छा का अर्थ है पर वस्तु के प्रेम में पागल होना और अपने भीतर के प्रेम का अनुभव नहीं होना। तुम स्वयं अपने में प्रेम का शीतल निर्झर हो। तुम स्वयं प्रेम का संगीत हो। तुम स्वयं प्रेम का मंदिर हो। किन्तु तुम्हें अपनी शक्ति का अहसास ही नहीं है। तुम्हें अपनी अमूल्य संपदा का पता ही नहीं है, तुम्हें अपने भीतर लहराते परमात्मा के समुन्दर का परिचय ही नहीं है। इसलिए तुम अपने से बाहर कुछ पाने के लिए बैचेन हो। मजे की बात तो यह है कि तुम अपनी बैचेनी के मालिक स्वयं हो और दर्शक भी स्वयं हो। काश वह दृष्टि जीवन में आ पाती जो हमारी बैचेनी को समाप्त कर देती तो सारी मूर्छा भी पलायन कर जाती और चेतना का जागरण हो जाता।
आचार्य श्री ने कहा कि फूल अपने में आनंदित है। झरने अपने में आनंदित है। भँवरे अपने में आनंदित है। एक मात्र मनुष्य ही ऐसा प्राणी है जो निरन्तर चिंतित है, परेशान है। मानव अपनी व्यर्थ की मूर्छा वासनाओं से दुःखी है। जो है उसमें संतोष नहीं, किन्तु जो नहीं है उसकी आकांक्षा है और इस दुनियां में आज तक कभी भी किसी की भी आकांक्षाएं पूर्ण नहीं हुईं। फिर भी आदमी का मन आकांक्षाओं की फैक्टरी बना हुआ है। मूर्छा आदमी को मुर्दा बना देती है। मूर्छा की भूख कभी नहीं मिटती। मूर्छा सुनियोजित पागलपन है। मूर्छा विवेक पर पत्थर रख देती है। मूर्छा जीवन के गुलशन को उजाड़ देती है।

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