इंदौर।

मान महा विष रूप करहि नीच गति जगत में अर्थात मान के मद में मदहोश व्यक्ति किसी को कुछ नहीं समझता। उसे ज्ञान का भी भान नहीं होता और वह इस कर्तत्व भाव में जीता है कि सबका में ही कर्ता हूं। घर संसार सब मैं ही चला रहा हूं, यह उसका भ्रम है। ऐसे लोगों को यह स्मरण रखना चाहिए कि ना कोई किसी का हर्ता, ना कोई किसी का कर्ता, होता स्वयं जगत परिणाम तू करता। जग का क्या काम? इसलिए अहं व कर्तत्व भाव में मत जियो और बकरा- बकरी की तरह मैं-मैं भी मत करो। बकरा करता मैं-मैं सो अपनी खाज खुजाए और मैना मैं-मै ना करें सो दूध भात नित खाए। मैं-मैं बोलोगे
तो अकेले रहोगे। हम बोलोगे तो सब आपके साथ रहेंगे और मार्दव धर्म भी रहेगा।
यह उद्गार उत्तम मार्दव धर्म पर समोसरण मंदिर कंचन बाग में प्रवचन देते हुए मुनि श्री आदित्य सागर जी महाराज ने व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि अंतरंग में सहज रूप से आपके परिणामों में नम्रता, कोमलता का होना मार्दव धर्म है। मान के प्रकार और कारणों पर प्रकाश डालते हुए मुनि श्री ने कहा कि ज्ञान, पूजा प्रतिष्ठा, कुल, जाति, बल, रूप, रिद्धि, और तप का यह आठ प्रकार के मद होते हैं और इन मद के वशीभूत अज्ञानी जीव अपनी विनम्रता एवं सरलता खोकर अहं में जीने लगता है और अपनी कल्पना से अपनी स्वयं की पहचान बनाने लगता है। अहंकार कितना भी कर लो, जिस दिन आयु कर्म की घंटी बजेगी कोई मान क्रोध काम नहीं आएगा। चिराग हर किसी के बुझते हैं। हवा किसी की नहीं होती। अतः अपने जीवन में अहंकार के वृक्ष मत लगाओ और विनम्रता के भाव लाओ। तजोगे मान, तभी बन पाओगे भगवान। धर्म सभा में आजाद जैन, अरुण सेठी, मनोज मुकेश बाकलीवाल, राजेंद्र सोनी, विमल गांधी और अशोक खासगीवाला आदि समाज जन उपस्थित थे। धर्म सभा का संचालन हंसमुख गांधी ने किया।
