बुद्धि से अधिक जहां भावनात्मक योग्यता होती है, वही सफलता मिलती है।, सुविज्ञ साग़र जी

JAIN SANT NEWS भीलूडा

बुद्धि से अधिक जहां भावनात्मक योग्यता होती हैै वही सफलता मिलती है। सुविज्ञ साग़र जी

भीलूड़ा

शांतिनाथ मंदिर में विराजित ज्ञान विज्ञान दिवाकर आचार्य कनकनंदी गुरुदेव के अंतरराष्ट्रीय वेबीनार का शुभारंभ सुवत्सलमती माताजी के मंगलाचरण से हुआ। आचार्य श्री द्वारा रचित कविता “बुद्धि से अधिक भावात्मक योग्यता से मिलती है सफलता” इसको सुविज्ञ सागर जी ने अपने मधुर कंठ से सुनाया तथा उसका भावार्थ बताते हुए कहां की
बुद्धि से अधिक जहां भावनात्मक योग्यता होती है वही सफलता मिलती है। धर्म की आधारशिला भाव प्रधान है। भावों की विशुद्धि के निम्न कारण है आत्म बोध, स्व नियंत्रण, शरीर नियंत्रण, इंद्रिय नियंत्रण, भावों पर नियंत्रण, प्रेरणा, सहानुभूति, सामाजिक कौशल आदि है। आत्मा बोध होने से भावनात्मक लब्धि बढ़ती है। सामाजिकता का विकास होता है। अच्छाइयों व बुराइयों को जानना तथा गुण दोषों का मूल्यांकन होता है। कम्युनिकेशन का अर्थ है आदान-प्रदान, संवाद, सुसंवाद होता है। इसी से सामाजिकता का विकास होता है। गुरु सेवा से सुगुण बढ़ते हैं तथा दुर्गुणों कम होते हैं। स्व विकास हेतु अन्य के सुझाव को स्वीकार करना चाहिए। जिस प्रकार आचार्य श्री सबको प्रोत्साहन, पुरुस्कार, प्रेरणा देते हैं तथा अन्य के अनुभव भी सुनते हैं। जिनका भावात्मक स्तर अच्छा नहीं होता है वह दूसरों को हतोत्साहित, अपमान, निंदा करता हैं। भावनात्मक स्तर में सुदृढ़ व्यक्ति का ही मार्गदर्शन व सहानुभूति लेनी चाहिए। बुद्धि प्रधान, बुद्धि पर आधारित लोगों की सहानुभूति नहीं लेनी चाहिए। क्योंकि उनमें संवेदनाएं नहीं होते हैं। अनपढ़ सामाजिक कौशल के कारण विपत्ति के समय अधिक सहिष्णु, सहयोगी, दयालु होते हैं। भावनात्मक व्यक्ति दूसरों पर दोषारोपण नहीं करता है। सेवा सहयोग करता है। भावनात्मक लब्धि बिना कोरी बुद्धि से सफलता नहीं मिलती। आत्म श्रद्धान भी भावनाओ से ही होता है। शिक्षा तथा धर्म सर्वोदय के लिए होना चाहिए। सर्वोदयी भाव वाला व्यक्ति सफल बनता है। बुद्धि को प्रधानता देने के कारण विद्यार्थी अधिक आत्महत्या कर रहे हैं। बुद्धि को प्रधानता देने के कारण समाज में सभी प्रकार की विषमताएं हैं। संवेदनाओं के बिना विषमताएं बढ़ रही हैं। आध्यात्मिक धर्म दया ,करुणा, सहयोग, संवेदनाएं सिखाता हैं। भावना प्राण वायु की तरह होती हैं। जितने अंश में नकारात्मकता बढ़ती है उसने अंश में दुख, विषमता, चिंताएं, टेंशन, रोग बढ़ते हैं। सकारात्मकता, मैत्रीपूर्ण व्यवहार से सुख शांति मिलती हैं। सत्ता संपत्ति डिग्री सुखी रहने का उपाय नहीं हैं। सच्चिदानंद बनना सुख स्वरूप बनना जीव का अधिकार हैं। दुखों का कारण राग द्वेष मोह हैं। समता से 99% मानसिक एनर्जी साइकोलॉजिक बचती हैं। समता से ही मोक्ष प्राप्त होता हैं। मानसिक सुख संकल्प और विकल्पों से रहित होने पर मिलता है। उत्तम कार्य होते हैं। हैप्पी हारमोंस स्रावी होते हैं। उत्साह तथा उदार भाव बढ़ता हैं। अच्छे विचार, अच्छे कार्य, मैत्रीपूर्ण व्यवहार, सत साहित्य का अध्ययन, सदाचरण, आत्म विश्वास, सरलता, सहजता आदि से सफलताएं मिलती हैं।

आचार्य श्री से स्वाध्याय मे भाव विशुद्धी के महत्व को समझा विजयलक्ष्मी गोदावत

विजयलक्ष्मी गोदावत

विजयलक्ष्मी गोदावत में अपना अनुभव बताते हुए कहा कि 2007 मे आचार्य श्री से स्वाध्याय मे भाव विशुद्धी के महत्व को समझा तब से बहुत प्रभावित हुई। आचार्य श्री के प्रोत्साहन व मार्गदर्शन से लेख भी अच्छे लिख रही हूं यह सब 2007 से गुरुदेव से ज्ञानार्जन का ही फल है जो उनकी वाणी को आत्मसात कर पा रही हूं। आचार्य श्री की समता का उदाहरण देते हुए बताया कि पहले आत्मा के ज्ञान के बिना सभी आचार्य श्री को विपरीत समझते थे लेकिन अब गुरुदेव के पास ज्ञानार्जन से सभी की विपरीत धारणाएं दूर हुई हैं। सभी आत्म विकास कर रहे हैं। सभी धार्मिक क्रियाएं आहार दान, पूजा, सेवा, ज्ञानदान, औषध दान सभी स्वयं के लिए कर रहे हैं। आचार्य श्री ने आगम के अनुसार आत्मा का अर्थ तथा महत्व प्रवचनसार ,रयणसार,छहढाला,द्रव्य संग्रह, आदि पुराण पुरुषार्थ सिद्धि उपाय आदि ग्रंथों के माध्यम से श्लोक गाथा सहित शरीर और आत्मा का भेद विज्ञान समझाया जिससे हमारी अनंत विपरीत मिथ्या ज्ञान दूर हुआ है। तथा सम्यक ज्ञान बढ़ रहा है।

संकलन अभिषेक जैन लुहाडीया रामगंजमडी

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