जिस शाश्वत तीर्थराज श्री सम्मेदशिखर जी से तीर्थंकरों और अनंत मुनियों ने निर्वाण की प्राप्ति की, ऐसे पर्वतराज का कण-कण पूजनीय है। श्री रविन्द्र जैन जी का भजन है —
कंकर कंकर बन गया मोती, पत्थर पत्थर धन्य हुआ ।अरिहंतो के चरण चूम जड़ पर्वत भी धन्य हुआ ।।
लेकिन क्या आप जानते हैं ? इसी महान पर्वत की वंदना मार्ग में दिन प्रतिदिन बढ़ती दुकानों से दुगने दाम पानी की बोतल, जूस, बिस्कुट, आलू प्याज के पकौड़े आदि अन्य अभक्ष्य खाद्य सामग्री को महंगे दाम में खरीदकर व पहाड़ पर प्लास्टिक की बोतलो और रेपर्स की गंदगी फैलाकर, पर्यावरण को नुकसान पहुचाकर और भीख देकर हम में से कुछ जैन बंधु उन लोगो को बढ़ावा दे रहे है। अजैनो के बढ़ते लालच व जैनो की अनावश्यक खरीददारी से पर्वतराज को बहुत नुकसान पहुंचाया जा रहा है ।
यहां अजैन लोग अपने निवास व अन्य धार्मिक स्थलों का निर्माण कर रहे हैं, और मांस, सिगरेट व शराब का सेवन कर क्षेत्र को अपवित्र करते हैं, यह उनके लिए पिकनिक स्पॉट से ज्यादा कुछ नही है, क्या हम सम्मेदशिखर जी को गिरनार जैसी स्थिति में ले जाना चाहते हैं ?निर्णय लें – क्या तीर्थ वंदना कर दर्शन कर पुण्य कमाने जाते है?आवश्यकता है, सामर्थ्य अनुसार पानी साथ लेकर जाए और पहाड़ पर प्लास्टिक का कचरा न फेंके और न ही इन दुकानों से कुछ भी खरीदे तभी सर्वोच्च तीर्थ सुरक्षित रह सकता है और इसके अलावा कोई दूसरा उपाय नहीं है।”अभी नही तो कभी नही” – एक स्वर में विरोध करें ।
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