श्री सन्तोष जैन का सलेखना पूर्वक समाधिपूर्वक मरण
दमोह
नगर के प्रतिष्ठित खजरी जैन परिवार के श्री संतोष कुमार जी का दिगंबर जैन धर्मशाला में आर्यिका रत्न मृदुमति माताजी एवं आर्यका श्री निर्णय मति माताजी के साथ विदुषी पुष्पा दीदी एवं श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान संपन्न करा रहे विधानचार्य शुभम भैया के मंगल सानिध्य में समस्त अन्य जल एवं वस्त्र का स्वयं त्याग कर उत्कृष्ट निर्मल परिणामों के साथ सल्लेखनापूर्ण समाधि मरण हो गया।23 मई को दोपहर 12:05 पर उन्होंने नन्हे मंदिर जैन धर्मशाला में अंतिम सांस ली उनका अंतिम संस्कार गौशाला जटाशंकर कॉलोनी में किया गया।

आर्यिका रत्न मृदुमति माताजी ने अपने मंगल उद्बोधन में कहा कि सिद्ध की आराधना करते हुए समाधि मरण की भावना भानी चाहिए। वह व्यक्ति अत्यंत सौभाग्यशाली होता है जो प्रभु के स्मरण के साथ अपने प्राणों को त्यागता है। 4 माह से साधना रत संतोष कुमार ने बहुत विशुद्ध भावों के साथ सल्लेखना की है। ऐसे निर्मल परिणाम विरले जीवो के होते हैं। इसे उत्कृष्ट समाधि मरण कहा जाता है। अंतिम क्षणों में उनके भाव वस्त्र को त्याग कर मुनि बनने के हुए जो कि अत्यंत उत्कृष्ट भावना है। यह भावना मनुष्य को भगवान बना देती है। मोक्ष का मार्ग प्रशस्त कर देती है। हम सब को उनके भावों की अनुमोदना करनी चाहिए।
विदुषी ब्रह्मचारिणी बहन पुष्पा दीदी ने कहा कि मृत्यु पर शोक करना अज्ञानता है, ज्ञानी मृत्यु को भी महोत्सव बना देता है। सल्लेखना समाधि मरण वह जीवन की कला है। जो मनुष्य को हंसते हुए मरना सिखाती है।
राजस्थान में अनेक स्थानों पर ऐसी कुप्रथा है जिसमें महिलाएं छह छह महीने तक पति के वियोग पर रोने और रुलाने का कार्य करती हैं जैन धर्म में मृत्यु पर अत्याधिक शोक करना दुख का कारण बताया गया अधिक शोक करने से दुख और अधिक बढ़ जाता जो कि असाता कर्म को बढ़ाने वाला होता है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाडीया रामगंजमडी
