● प्राकृत जैनागम मूलग्रन्थ स्वाध्याय●
Day 32 : : तत्त्वसार गाथा 62 – 63
ग्रंथकार- आचार्य देवसेन स्वामी
प्रस्तुति- डॉ. पुलक गोयल, जबलपुर
अप्प-सहावे थक्को
जोई ण मुणेइ आगए विसए।
जाणइ णिय-अप्पाणं
पिच्छइ तं चेव सुविसुद्धं।।62।।
ण रमइ विसएसु मणो
जोइस्सुवलद्ध-सुद्ध-तच्चस्स।
एकीहवइ णिरासो
मरइ पुणो झाण-सत्थेण।।63।।
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तत्त्वसार | आचार्य देवसेन स्वामी | द्रव्यानुयोग | गाथा 01-74 | शुद्ध पाठ | शब्दार्थ | व्याकरणिक विश्लेषण | व्याख्या | डॉ. पुलक गोयल : https://www.youtube.com/playlist?list=PLb6OtA3xYjEMlxRECwcg1rrSXHjC5L_lg
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