विद्याधर से विद्यासागर

*☀विद्यागुरू समाचार☀* विद्याधर से विद्यासागर

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श्रद्धाकीभाषा🙂:

तब तक पूज्य ज्ञानसागरजी ने अनन्त की ओर देखा, फिर बोले- तू भी बात कर ले। गुरुवर का आदेश पा अनन्तनाथ प्रसन्न हो गए। पर इतने छोटे थे कि प्रश्न करने की हिम्मत न जुटा सके हाथ जोड़कर खड़े हो गए विद्यासागर के समक्ष जीभ साथ न दे रही थी, ऐसे समय सदा से धोखा देती रही है, सो उस रोज भी उनके समक्ष धोखा दे गई। न निकले कोई शब्द।

श्रद्धा को कहते हैं, शब्दों की जरूरत ही नहीं पड़ती। न निकले शब्द तो क्या अनन्तनाथ का कार्य रुक गया? नहीं रुका। जहाँ जिल्ला कार्य करने में लजियाती है, वहाँ आँखें उस कार्य को अपने हाथ में ले लेती हैं। अनन्तनाथ के शब्द आँखों के रास्ते से जल बिन्दु बनकर निकलने लगे। गालों की स्लेट पर आँखों से निर्झरित स्याही से श्रद्धा गीत कोई लिखने लगा गाल पर बह आए आँसू जैसे पूछ रहे हो-जीवन भर के लिए आपने भाई का नाता तोड़ लिया?

उस दिन शब्द विदा लेकर किसी अदीठ दिशा में खो गए थे। अनन्तनाथ सोचते हुए भी यह नहीं पूछ सके कि यह बाना क्यों अपनाया? क्या था इसके पार्श्व में?

सदलगा के प्रेमोन्मुख लोग रोज-रोज मुनियों के लिए चौका लगाते थे, जब तब उन्हें पुण्य भी मिलता था आहार-दान का।।

एक दिन मल्लप्पाजी के चौके में… हाँ श्री जी के चौके में… हाँ अनन्तनाथ के चौके में…हाँ शान्तिनाथ के चौके में… सम्पन्न हुए निरन्तराय आहार मुनि विद्यासागर के जन भर नहीं, तन-मन-जीवन धन्य हो गया उन सरल श्रावकों का आहारोपरान्त चलने लगे मुनिवर तो कई सिर नब गए चरणों के समक्ष। दो सिर झुके तो देर तक न उठे। देखा मुनिवर ने उनकी ओर तो अनन्त और शांति क्या चाहते हैं आप लोग पूछ बैठे मुनिवर आशीर्वाद दीजिए।

मुस्का दिए मुनिवर फिर दो सिरों के लिए दो बातें बोल दीं मन रखने के लिए। शांतिनाथ से बोले- तू शांतिसागर बनेगा। फिर बोले अनन्तनाथ से तुम माता पिता की सेवा करते रहो।

दोनों किशोर हँसते-मुस्काते रहे। किसी ने समय का गर्भ न अथाहा था, सो चुप रहे। कौन जानता था कि मुनिवर के आशीष प्रभाव से देश को दो युवा मुनि मिलने वाले हैं कालान्तर में।

पोस्ट-102…शेषआगे…!!!

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