मील का पत्थर
परम पूज्य आचार्य श्री108 ज्ञानसागर जी महाराज वर्तमान युग के ऐसे युवा द्रष्टा, क्रांतिकारी विचारक, जीवन सर्जक और आचारनिष्ट दिगबर सन्त थे, जिनके जनकल्याणी विचार जीवन को अत्यधिक गहराइयो अनुभूतियों एवम साधना की अनंत ऊंचाइयो तथा आगम प्रामाण्य से अद्भुत हो।
मानवीय चिंतन के सहज परिष्कार से सन्नद्ध है। आचार्य परंपरा का नवीनीत, गुरुदेव के जीवन से प्रतिबिंबित हुआ था। और यही कारण है कि मानवीय उर्जा के रचनात्मक उपयोग की संभावनाओं का पता लगाने मे अभिरुचि रही थी। जड़ता एवम प्रमाद की स्थिति से उन्हे इनकार था और समय के प्रत्येक क्षण का सम्पूर्णता में उपयोग करने एवं रचनात्मक प्रस्तुति करने में उनका पूर्ण विश्वास था।
उनका मानना था कि समय की सही पकड़ एवं उसकी सम्रग ऊर्जस्विता के दक्षवत प्रयोग से ही विकास का मार्ग प्रशस्त हो सकता है। वे चिंता के स्थान पर चिंतन, व्यथा की जगह व्यवस्था और प्रशंसा की बजाय प्रस्तुति की संस्कृति के उदघोषक थे। यही कारण है इस वाग्मी निर्लिप्त निष्काम संत की चिंतन यात्रा अनेकान्तिक अवधारणाओं का एक ऐसा चमकता आईना था, जिसमे मानवीय संवेदनाओं का हर रूख सुख और शांति के अणुव्रतो के रूप मे प्रतिबिंबित होता रहता था। पुज्य गुरुदेव के उपदेश हमेशा जीवन समस्याओं सन्दर्भों की गहनतम गुत्थियो के मर्म को संस्पर्श करते थे, जीवन को उसकी समग्रता में जानने औऱ समझने की कला से परिचित कराते है। उंनके साधनामय जीवन को शब्दो की परिधि मे बांधना संभव नहीं था हा, उनमे शब्दो अवगाहन करने की कोमल अनुभूतिया शब्दादीत थी उनका चिंतन फ़लक देश काल संप्रदाय जाति धर्म सबसे दूर प्राणीमात्र को समाहित करता था एक युग बोध देता है नैतिक जीवन जीने की प्रेरणा देता है वैश्विक मानव की अवधारणा को ठोस आधार देता है जहा दूर दूर तक कही भी दुरूहता नहीं है जो है वह है भाव प्रवणता सम्प्रेषणीयता और रत्नत्रयों के उत्कर्ष से विकसित हुआ उनका प्रखर तेजोमय व्यक्तित्व जो बन गया गया था करुणा समता और अनेकान्त का एक जीवन दस्तावेज

पूज्य श्री जीवन क्रांति का एक श्लोक है साधना मुक्ति का दिव्य छन्द है तथा है मानवीय मूल्यो की वंदना एवं मानसिक ऐश्वर्य के विकास का वह भागीरथ प्रयत्न जो स्तुत्य है वंदनीय है और है जाति वर्ग संप्रदाय भेद से परे पूरी इंसानी जगत की बेहतरी एवं उसके बीच सत्वेषू मैत्री की संस्थापना को समर्पित एक छोटा पर एक बहुत बड़ा कदम गुरुदेव तो वीतराग साधना पथ के पथिक है निरामय है निर्ग्रंथ है साधना मे रचे है दर्शन ज्ञान आचार की त्रिवेणी है आचार्य श्री की सवेदनाये मानव मन की गुत्थियों को खोलती है और तंद्रा मे डुबे मनुज को आपाद मस्तक झिंझोडने की ताकत रखती हैहम तो यही भावना भाते है आचार्य श्री के संदेश युगो युगो तक सम्पूर्ण मानवता का मार्गदर्शन करे हमारी प्रमाद मूर्छा को तोड़े हमे अंधकार से दूर प्रकाश के उत्स के बीच जाने का मार्ग बताते रहे हमारी जड़ता की इति कर हमे गतिशील बनाए संभ्य सुसंस्क्रत बनाते रहे यही हमारे मंगलभाव है हमारी चित की अभिव्यक्ति है और है हमारी प्रार्थना भी
शत शत नमोस्तु
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़ीया रामगंजमंडी
