अहंकार मनुष्य को नीच गति में ले जाता है कनकन्दी गुरुदेव
भीलूड़ा ।
आत्मज्ञानी वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदी गुरुदेव ने अंतरराष्ट्रीय वेबीनार में बताया कि आत्मज्ञान, वीतराग विज्ञानता बिना धर्म का चोला पहनकर धर्म का ढोंग मान कषाय के कारण करना यह दोष होता है। अहंकार मनुष्य को अनेक नीच गतियो में ले जाता है। इससे नीचे गोत्र का बंध होता है। मैं अंतर आत्मा हूं परमात्मा बनू ऐसा अनुपम भाव होना चाहिए। स्व गौरव, स्व श्रद्धान, आत्म प्रतीति मान कषाय को नष्ट कर सकती है। अरिहंत सिद्ध कषायवान तथा परिग्रही नहीं है। उनका ध्यान, ज्ञान, चर्चा, समझना जरूरी है। आत्मज्ञानी स्व का चिंतन, भेद विज्ञान किए बिना करोड़ों भव मुनि बनने पर भी उत्तम देव भी नहीं बन सकते। निर्दोष साधु की निंदा करने वाले अनंत भव तक दुख भोंगते हैं। भाव कषाय, तृष्णा, परिग्रह है। इससे करोड़ों भव तप करने पर भी मोक्ष नहीं हो सकता है। आत्मज्ञानी भेद विज्ञान द्वारा, ध्यान द्वारा अंतर मुहूर्त में मोक्ष प्राप्त कर सकते हैं। दान भी नाम के लिए करना अहंकार है, देव दुर्गति का कारण है। आचार्य श्री कहते हैं भिखारी नहीं भक्त बनो प्रसिद्धि के लिए अहंकार के लिए मान के लिए पुस्तक लिखना, कविता लिखना भी पाप बंध का कारण है। इहलोक, परलोक में इंद्रिय जनित सुख चाहना, स्त्री, पुरुष को चाहना पाप कारक है। आत्मज्ञान से सभी प्रकार के लौकिक ज्ञान सही हो जाते हैं। परिग्रह के कारण स्वर्ग के देव, मनुष्य सब आकुल व्याकुल रहते हैं। आकुलता, व्याकुलता के कारण वापस एक इंद्रिय वृक्ष आदि बनते हैं। जिसका चित्त व्याकुल रहता है उसको सुख कैसे मिल सकता है? सुख मिलता है वही प्रीति होती है, प्रीति होती है वहां राग होता है। बहिरंग दृष्टि वाले को, मोह से आसक्त वाले को आत्म प्रतीति नहीं होती सुख शांति नहीं मिलती। दान देने से निस्पृह रहने से सुख अनुभव होता है। साधु आत्म स्वभाव का भोग करते हैं। स्व से रति करो प्रेम करो इसके लिए किसी स्त्री, पुरुष की आवश्यकता नहीं स्वयं को प्रेम करने से पर का अवलंबन नहीं लेना पड़ता । स्वयं का सुख शाश्वत है। वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदी गुरुदेव के परम शिष्य आचार्य विद्यानंदी जी ने बताया अधिकतर संसारी जीव इंद्रिय सुख की उपासना कर रहे हैं। सुख की चाह सभी को है परंतु सुख पाने का मार्ग नहीं अपना रहे हैं। मनुष्य में मान कषाएं अधिक रहती है। मानी व्यक्ति कभी भी सम्यक दर्शन को प्राप्त नहीं कर सकता। एक इंद्रिय जीवो की तो रक्षा करते हैं परंतु संज्ञी पंचेेंद्रीय व पंच परमेष्ठी की अवहेलना , निंदा, द्वेष आदि करते है। मुनि श्री सुविज्ञ सागर जी गुरुदेव ने धर्म होता है आत्म स्वरूप आचार्य श्री द्वारा रचित कविता द्वारा मंगलाचरण किया
विजय लक्ष्मी जैन से प्राप्त जानकारी
संकलन अभिषेक जैन लुहाडिया रामगंजमडी
