इंदौर। जिस व्यक्ति के बोलने, सोचने और कार्य करने में वक्रता नहीं होती अर्थात कुटिलता (मायाचारी) नहीं होती। उसे ही आर्जव धर्म की
प्राप्ति होती है। मन, वचन और काय की सरलता का नाम आर्जव धर्म है। मायाचार रहित जीवन जीना है तो दर्पण, बालक और बांसुरी के समान जीवन जियो। व्यक्ति की छवि जैसी होती है, दर्पण में वैसी ही दिखाई देती हैष बालक मन के सच्चे और सरल होते हैं एवं बांसुरी बिना ग्रंथि (गांठ) सीधी और सुरीले स्वर वाली होती है। हमें भी मन, वचन और काय की एकरूपता के साथ सरलता का जीवन जीने का प्रयास करना चाहिए। एकरूपता का जीवन जो जीता है, वह धर्मेश्वर और जो मन, वचन, काय की कुटिलता के साथ जीवन जीता है, वह नरकेश्वर है।
यह उद्गार मुनि श्री आदित्यसागर महाराज ने शुक्रवार को आर्जव धर्म पर समोसरण मंदिर बाग में प्रवचन देते हुए व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि आज व्यक्ति व्यापार, व्यवहार, क्षमा, त्याग जो भी करता है, उसमें मायाचार दिखाई देता है। पिता पुत्र के साथ, पुत्र माता पिता के साथ, पड़ोसी के साथ गुरुओं के साथ और यहां तक कि भगवान के सामने भी मायाचार का प्रदर्शन कर कर्म बंध करता रहता है।
अंत में मुनिश्री ने कहा कि यदि आपके मन में किसी को ठगने के भाव आ रहे हैं तो यह मायाचार है। अतः मायाचार छोड़ो, सरलता धारण करो। प्रचार प्रमुख राजेश जैन दद्दू ने बताया कि यहां चल रहे संस्कार शिविर में शिविरार्थी मुनि संघ के सानिध्य में धर्म के 10 लक्षणों के अनुरूप ढोंग का नहीं, ढंग का जीवन जीने का अभ्यास कर रहे हैं। धर्म सभा का संचालन हंसमुख गांधी ने किया।
