महावीर जी। वात्सल्य वारिधि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महावीर जी ने दशलक्षण पर्व के तीसरे दिन उत्तम आर्जव धर्म के बारे दिवस बताया कि क्रोध छोड़ने से क्षमा धर्म प्रकट होता है, मान छोड़ने से मार्दव धर्म प्रकट होता है, इसी प्रकार मायाचारी छोड़ने से आर्जव धर्म प्रकट होता है। आर्जव धर्म का सरल आशय है कि जीवन में सरलता होनी चाहिए। वक्रता या टेढ़ापन नहीं होना चाहिए। वक्र परिणामों के कारण संसार में अनेक गतियों में आप लोगों ने भ्रमण किया है। संसारी जीव को सरलता का भाव धारण करना चाहिए। माया से रहित हमारा जीवन होना चाहिए। विनोद जी पाटनी किशनगढ़, जय कुमार निवाई, गोपाल जी ने बताया कि आचार्य श्री ने कहा कि चारों गति में कषाय प्रमुख है जैसे मान की प्रधानता मानव गति में है, तिर्यंच गति में माया की प्रधानता है, नरक गति में क्रोध की प्रधानता है और देवताओं में लोभ की प्रधानता है। वैसे सभी जीवों में चारों गतियों में सभी प्रकार की कषाय पाई जाती है किंतु उक्त कषाय की प्रधानता मुख्य है। जीवन को सार्थक करने की सीढ़ी का नाम दशलक्षण पर्व है। गजु भैया, राजेश पंचोलिया अनुसार आचार्य श्री ने यह भी बताया कि आप चारों गतियों में घूम रहे हैं। अनादिकाल से हम भटक रहे हैं। हर भव जन्म में हमारे निवास बदलते रहते हैं। चौदह राजुल ऊपर सिद्धालय ही वास्तविक घर है। सिद्धालय प्राप्त करने के लिए जीवन में सरलता लानी होगी। मनुष्य जीवन में अनेक आवश्यक कर्तव्य हैं, जिनमें देव पूजा अभिषेक सहित करना शामिल है। सभी श्रावक-श्राविकाओं को अभिषेक करना चाहिए। जो नारी साधुओं को आहार दे सकती है, उनके लिए आहार तैयार कर सकती है, तब प्रभु अभिषेक के लिए कपितय लोग विरोध क्यों करते है। दुर्गति को हटाकर सुगति को प्राप्त करना चाहिए और जीवन में सरलता लाकर मोक्ष मार्ग की ओर हम कदम बढ़ा सकते हैं। आर्जव धर्म से जीवन में सरलता लाकर और सिद्ध गति की राह पर चलकर मोक्ष की प्राप्ति होती है। संसार के प्राणियों को शाश्वत सुख तभी मिलेगा, जब वे सरल भाव धारण करेंगे। कुटिलता छोड़कर सरलता अपनाना चाहिए।
आचार्य श्री ने बताया कि पर्व में धर्म भी मनोरंजन प्रिय हो गया है। आत्म साधना में मनोरंजन की जगह आत्म रंजन होना चाहिए। आत्मा का रंजन जब होगा, तभी हमारा जीवन मंगलमय होगा।
