धर्म प्राचीन अर्वाचीन नहीं धर्म तो समीचीन होता है

JAIN SANT NEWS

धर्म प्राचीन अर्वाचीन नहीं धर्म तो समीचीन होता है

आचार्य समंतभद्र स्वामी ने श्री रत्नकरंडक श्रावकाचार जी में धर्म निरूपण के समय यह उक्ति कही कि-धर्म प्राचीन अर्वाचीन नहीं समीचीन होता है क्रिया और भाव की समीचीनता ही धर्म को उद्घाटित करती है।

आज दसलक्षण पर्व के प्रथम दिन उत्तम क्षमा का दिवस है आज के दिन क्षमा वीरस्य भूषणं का यह वचन प्रति व्यक्ति में लक्षित होता ही है पर यह सूत्र आचरणीय है

क्षमा धर्म का अर्थ केवल क्रोध को छोड़ना ही नहीं अपितु क्रोध त्याग के साथ साथ ही सहनशीलता धारण करना भी है। सहनशील व्यक्ति जो शत्रु का प्रतिकार करने की क्षमता रखता है वो अगर अपकारी को क्षमा करें उसके कृत्यों को सहन करते हुए परिणामों में शीतलता रखे तब वह वास्तव में क्षमा धर्मधारी कहलाता है।

हम गृहस्थों के लिए क्षमा का अर्थ उपकारयुक्त प्रवृत्ति से है जिसमें वृक्ष की तरह परोपकार की भावना सतत रहती है।

गृहस्थ रहते हुए क्रोधत्याग पूर्णरूपेण तो संभव नहीं फिर भी कुछ स्थानों पर क्रोध का त्याग या मंदता आवश्यक ही होती है। जिनालय जिनगुरु आदि शरण में जाने पर भाव इतने निर्मल होने चाहिए कि प्रतिकूलता होने पर भी क्षमा धारते हुए उसे अनुकूल बना लेवें।
धर्म के कार्य में कोई नया व्यक्ति या बच्चा आये तो उसका उत्साह वर्धन करें ना कि कुछ गलती होने पर उसे डांटे।
ना शान कुछ कम होती ना रुतबा घट गया होता
जो तुमने क्रोध में बोला अगर यही प्रेम से बोला होता

इसलिए धर्म मार्ग में क्रोध से कार्य ना करें क्रोध शांति का नाशक है और किसी दूसरे के अपराध की खुद को सजा देना है क्रोध ।

जीवन मे यह लक्ष्य हमेशा ही रहना चाहिये-
किसी दूसरें के कारण हमारी शांति नष्ट ना हो

अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी

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