षट खंड अधिपति चक्रवती भी सांसारिक वैभव छोड़कर धर्म की शरण लेते है वात्सलय वारिधि आचार्य श्री वर्द्धमान सागर जी

JAIN SANT NEWS श्री महावीर जी

षट खंड अधिपति चक्रवती भी सांसारिक वैभव छोड़कर धर्म की शरण लेते है वात्सलय वारिधि आचार्य श्री वर्द्धमान सागर जी

श्री शान्तिवीरशिवधर्माजीत वर्द्धमान सुर्रिभ्यो नमः

महावीर जी राजस्थान

धर्मानुरागी महानुभावो, संसार में प्राणी सेकड़ो कष्टों। से ग्रसित हैं, उनके जीवन में नाना प्रकार के क्लेश पाए जाते है। रोगों ने उनके शरीर को अपना घर बना के रखा है, मरण का भय संसार के प्राणियों को नित्य ही सताता रहता है। दुःख और शोक से जो निरंतर पीड़ित रहते है, ऐसे जगत के प्राणी जो नाना प्रकार की आकुलताओं से सहित उनको इस जगत में अगर कोई शरणभूत हो सकता है तो वह एक मात्र धर्म।

यह मंगल देशना पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्द्धमानसागर जी महाराज ने वर्द्धमान सभागार में प्रकट किये।

बाल ब्रह्मचारिणी नेहा दीदी पूनम दीदी दीप्ति दीदी ने बताया कि आचार्य श्री ने प्रवचन में आगे बताया कि जगत में धर्म के अतिरिक्त कोई भी शरण नहीं है।

संसार के प्राणी धर्म से प्रीती करते है, संसार के प्रणियों को धर्म से प्रीति करना चाहिए ।। आप लोगो के पास तो बहुत सारी शरण है, पुत्रम् शरणं गच्छामि, बुढ़ापे में पुत्र की शरण में चले जायेगे और पुत्र नही तो पुत्री की शरण में चले जाएँगे। यो ही निभा दे आपको? नहीं तो गोद का ले लावेंगे। शरण में जाना ही पड़ेगा ना बुढ़ापे में इसलिए गोद का लाकर के घर में रख देंगे! पर न तो आज तक पुत्र की शरण में जाकर के किसी ने सुख शांति प्राप्त की है। न पुत्री की शरण में और न ही गोदी के पुत्र ने वह सुख और शांति दी है, यदि संसार के बंधु-बांधव जिन्हें हम मानते है। वे सुख और शांति दे सकते होते तो भरत चक्रवर्ती सगर चक्रवर्ती के तो 60,000 पुत्र थे,चक्रवतीयो के पुत्र तो बहुत होते है, 96000 रानियों होती है तो अनेक पुत्र होते है ।

उनके और जाने दो भगवान श्री आदिनाथ के पास तो 101 पुत्र थे, क्या हुआ क्यों छोड़ दिया उन्हें,षट्खण्ड का अधिपति चक्रवर्ती होने वाला पुत्र जिनके घर में जन्मा हो, उसको किस बात की कमी थी, क्यों छोड़ा? उन्हेंऔर उनके पास राज्य वैभव की भी कोई कमी नहीं, को उसके पास -फिर भी इन सबको छोड़ करके उन्होने धर्म की शरण को प्राप्त किया। केवली भगवान के द्वारा कहा गया प्रतिपादित किया गया जो धर्म जगत में उत्तम है।, क्योंकि संसार के प्राणी बड़े कुशल है। संसार की सर्वश्रेष्ठ वस्तु को प्राप्त करना चाहते है। अब वर्तमान में देख लो लोगो का संसार का संसार कहा तक है।

मार्केट उनका संसार है। मार्केट मे जो सर्वोत्तम वस्तु आई। बो सबसे पहले मेरे घर में आना चाहिए।

आचार्य श्री वर्द्धमान सागर चातुर्मास कमेटी के अध्यक्ष श्री राजकुमार जी सेठी जयपुर एवम श्री नरेश सेठी ने बताया कि प्रथमाचार्य चारित्र चक्रवर्ती आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज की अक्षुण्ण मूल बाल ब्रह्मचारी पट्ट परंपरा की तृतीय पट्टाधीश आचार्य श्री धर्म सागर जी से दीक्षित पंचम पट्टाधीश 72 वर्षीय वात्सल्य वारिधि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी 28 साधुओं सहित संयम वर्ष का 54 वा पावन वर्षायोग अपनी मुनि दीक्षा स्थलीअतिशय क्षेत्र श्री महावीर जी मे कर रहे है।

राजेश पंचोलिया इंदौर
वात्सल्य वारिधि भक्त परिवार

संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमडी

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