ज्ञानी और महान आत्मा अपने साथ रहने वालों को भी अपने जैसा बना लेती है प्रभु की आराधना करने वाला ही आराध्य बनता है:माताजी

ग्वालियर,
जो कर्मों का नाश कर सिद्धालय में विराजमान हो चुके हैं, वह वंदनीय हैं, अभिनंदनीय हैं। वह वंदना करते-करते वंदनीय बन गए। जो वंदना नहीं कर पाए, वह आज भी अभिनंदनीय नहीं बन पाए। जो आराधक नहीं बना, वह आराध्य नहीं बन सकता। जो साधक साधना नहीं कर सकता, वह साधक कैसे बन सकता।यह उदगार ब्रह्म विद्या वाचस्पति पट्ट गणिनी आर्यिकाश्री विज्ञमती माताजी ने शुक्रवार को चम्पाबाग बगीची में गणधर वलय स्तोत्र सेमिनार में व्यक्त किए।

माताजी ने कहा कि तीर्थंकरों के चरणों के मूल में बैठकर दीक्षा ग्रहण कर गुरु परंपरा का अनुसरण करने वाले गणधर देव बने। उन गणधर स्वामी की हम यहां आराधना कर रहे हैं।
संगत का असर होता है




माताजी ने बताया कि ज्ञानी और महान आत्मा अपने साथ रहने वालों को भी अपने जैसा बना लेती है। जिसने धर्म को छोड़ा, उसे धर्म डुबा देता है। जो धर्म के साथ रहता है, उसे धर्म उबार देता है। इसलिए धर्म को कभी नहीं छोड़ना चाहिए।
मन की ग्रंथियों को खोलें

माताजी ने कहा कि जो विशिष्ट बुद्धि में दक्ष होते हैं, वह मुक्ति लक्ष्मी का वरण करते हैं। सर्व मुनि होते हैं। माताजी ने कहा कि हमें अपने मन की ग्रंथियों को खोलना है। मन की ग्रंथि खोलने से मुनियों के गुण प्राप्त होते हैं।
एक अगस्त को होगी परीक्षा

जैन समाज के प्रवक्ता ललित जैन के अनुसार माताजी ने बताया कि इस सेमिनार में शामिल सेमिनार्थियों की एक अगस्त लिखित परीक्षा होगी, जो लिखित परीक्षा नहीं दे सकते, उनकी परीक्षा मौखिक ली जाएगी। 3 अगस्त को परीक्षा का परिणाम घोषित होगा। प्रवचन सभा का दीप प्रज्वलन चक्रेश जैन, अरिहंत जैन, सीमा जैन, अपूर्वा जैन ने किया!
संकलन अभिषेक जैन लुहाडीया रामगंजमडी
