नैतिक राज्य नियमो का पालन नही करना चोरी है कनकनदी गुरुदेव
भीलूड़ा
आचार्य कनक नंदी गुरुदेव ने शांतिनाथ मंदिर में अंतर्राष्ट्रीय वेबीनार को संबोधित करते हुए बताया कि तीर्थंकरों ने उपदेश परम शांति के लिए दिया है। नैतिक राज्य नियमों का पालन नहीं करना चोरी हैं। बिना परिश्रम जो कुछ कमाते हैं वह चोरी है। न्याय से, श्रम से उपार्जन नही किया हुआ धन चोरी है। जहां झूठ है, वहां मायाचारी, चोरी, हिंसा, परिग्रह आदि पांचो पाप होते ही हैं। जहां दूसरों का अधिक शोषण होता है वहां मिलावट, चोरी, झूठ, भ्रष्टाचार आदि सभी पाप होते ही हैं। दूसरों के दोष जानते हुए भी निंदा नहीं करनी चाहिए। न्यासापहार का अर्थ दूसरों की रखी हुई धरोहर को हड़प लेना, साकार का अर्थ है मिलावट करना। चोरी का माल लेना, चोरी करने के लिए प्रोत्साहन करना, लाइसेंस देना आदि सभी कार्य चोरी ही है। राजनीति, कानून, अर्थशास्त्र, संविधान आदि सभी न्याय पूर्ण होने चाहिए। राजा को प्रजा का सुख दुख देखने के लिए स्वयं समाज के बीच लोगों के बीच मैं जाकर स्वयं पता लगाना चाहिए। कि देश में राज्य में क्या कमी हैं। राजा को, श्रावकों को गर्भस्थ शिशु की तरह साधु की व्यवस्था करनी चाहिए। आचार्य श्री ने कान्फिशियस का उदाहरण देते हुए बताया कि वह दार्शनिक राजनीतिज्ञ थे, वह स्वयं प्रजा के बीच जाकर पता लगाते हैं कि उनका शासन किस तरह का हैं। एक बूढ़ी अम्मा जंगल में रो रही थी उनसे पूछने पर वह कहती है कि उसके बेटे पति सबको आदमखोर शेर ने खा लिया फिर वह पूछते हैं फिर भी तुम यहां पर क्यों रुकी हुई हो वह बुढ़िया बोलती है कि यहां का राजा बहुत अच्छा है अपनी प्रजा का दुख दर्द स्वयं अपना दुख दर्द समझता है इसलिए मैं देश छोड़कर नहीं जाना चाहती। राजा हो या नेता हो सभी को अपनी प्रजा का दुख दर्द अपना दुख दर्द समझना चाहिए। सभी लोग सुखी होंगे तो चोरी भ्रष्टाचार मिलावट अन्याय आदि भी नहीं होंगे। जैन धर्म तथा हिंदू धर्म किसी मैं भी नीति नियम में कोई अंतर नहीं है केवल सिद्धांत अलग हैं। जिज्ञासा करने से ज्ञान बढ़ जाता है तथा अनेक समस्याएं दूर हो जाती है।
विजय लक्ष्मी गोदावत से प्राप्त जानकारी
संकलंन अभिषेक जैन लुहाडीया रामगंजमडी
