दीक्षा के दिन को याद कर वैराग्य को हर पल बनाये रखतें हैं-आर्यिका आदर्श मति माता जी
अशोक नगर
दीक्षा के दिन को याद करना हमने घर क्यों छोड़ दीक्षा क्यों ली और वैराग्य को हर पल बनाये रखने के लिए दीक्षा दिवस मनाया जाता है।
जिनके चरण सानिध्य में हमने दीक्षा ली है। उनका व्यक्तित्व ऐसा है कि उनको याद करते हुए उनके बताये हुए मार्ग पर कदम दर कदम आगे बढ़ते चलें जातें हैं। आचार्य भगवंत का कहना है कि मोक्ष मार्ग भीतर का है,बाहर का है ही नहीं। बाहर तो सब ओर राग रंग भरा पड़ा है।
आचार्य भगवंत के सान्निध्य में सागर में सन 1980मे जब वाचना चल रही थी तब उन्होंने कहा था, जहां संसार है वह संघर्ष है। संघर्ष से बचने के लिए कर्त्तव्य बुद्धि से कार्य करना चाहिए। जहां कर्तव्य बुध्दि होती है वहां मैं नहीं आता। वहाँ हम आ जाता है। जहाँ हम होता है, वहाँ अकेले हम ह नहीं सभी आ जाते हैं। हम के माध्यम से संसार में रहकर भी संघर्ष से दूर रह सकते है।
यह उद्गार सुभाष गंज में रजत दीक्षा दिवस समारोह को सम्बोधित करते आर्यिका आदर्शमती माताजी ने व्यक्त किए।
दीक्षा मिलना कठिन है उससे भी कठिन उसका पालन करना है–श्वेतमतिजी

आर्यिका श्री श्वेत मति माता जी ने कहा कि यह अवसर कुछ कहने का नहीं है, फिर भी गुरुओं का गुणगान करते रहना चाहिए। हम दीक्षा के समय को हमेशा याद रखते हैं। अमावस्या की काली रात में काले धागे को काली सुई में डालने से से भी दुर्लभ है,ये संयम सुमेरु का पहाड़ है, इसे लेने कोई बच्चो का खेल नहीं है। गुरु के वचन पीछे की हवा की तरह आगे बढ़ने में सहयोग करने के लिए बढाते चलें जातें हैं। माताजी ने कहा सुबह नो बजे तक हमें पता नहीं था, और दोपहर में दीक्षा हो गई। दीक्षा मिलना बहुत कठिन है उससे भी अधिक कठोर है उसे पालन करना।
दीक्षा संस्कार का मूहुर्त होता है


श्वेतमति माताजी ने कहा कि
दीक्षा दिवस आखिर होता क्या है? दीक्षा संस्कार का मूहुर्त होता है। दीक्षा तो प्रति पल होती है, साधक प्रति पल दीक्षा को सावधानी पूर्वक आगे बढ़ते रहता है।जैसे कि वाहन चालक वाहन चलाते हुए यदि बारिश आ जाये तो वह पानी साफ करते हुए आगे बढ़ते रहते हैं। वैसे ही साधक सावधानी पूर्वक प्रति पल आगे बढ़ते चले जाते हैं। श्रावक और साधु को हर समय सचेत रहने को कहा गया है। दीक्षा की खुशी गूंग के गुण के समान होती है। जीवन में आप भी चखना चाहते हैं तो इस मार्ग पर आगे बढ़ना होगा।
संकलन अभिषेक जैन लुहाडीया रामगंजमडी
