सम्यक दर्शन होने पर मोक्ष का स्वरूप प्राप्त होने का लक्ष्य निर्धारित हो जाता है आचार्य कनकनन्दी

JAIN SANT NEWS गलियाकोट

सम्यक दर्शन होने पर मोक्ष का स्वरूप प्राप्त होने का लक्ष्य निर्धारित हो जाता है आचार्य कनकनन्दी

गलियाकोट

सिद्धांत चक्रवर्ती आचार्य कनक नंदी संघ के सानिध्य में समाधिस्थ क्षुलिका 105 पराग श्री माताजी के परिवार जन ने शांति विधान किया l उसके उपरांत एक वेबीनार आहूत हुआ जिसमे मंगलाचरण सुविज्ञ सागर जी गुरुदेव ने आचार्य श्री द्वारा रचित कविता “मेरा मन दर्पण सम होय” द्वारा किया l आचार्य श्री कनकनन्दी जी गुरुदेव ने वेबीनार को संबोधित करते हुए बताया कि सम्यक दर्शन होने पर मोक्ष का स्वरूप प्राप्त करने का लक्ष्य निर्धारित हो जाता है l जिस प्रकार शिखरजी जाने के भाव होते ही लक्ष्य निर्धारित हो जाता है l कोई भी कार्य करने से पहले लक्ष्य निर्धारण किया जाता है l सम्यक दर्शन होने पर भी सम्यक ज्ञान तथा सम्यक चारित्र जुड़ नहीं पाते हैं, समन्वय नहीं हो पाता है l धर्म आत्म स्वरूप है l निश्चय के लिए व्यवहार का वर्णन है l प्राथमिक काम ज्यादा कठिन होता है l छोटे बच्चे को अक्षर ज्ञान कराना पीएचडी से भी कठिन है l वैसे ही सम्यक दर्शन प्राप्त करना बहुत कठिन है l जिस प्रकार अक्षर ज्ञान होने पर ही पीएचडी अर्थात संपूर्ण ज्ञान नहीं हो जाता, उसी प्रकार सम्यक दर्शन होते ही मोक्ष नहीं प्राप्त हो जाता है l उसके लिए परम पुरुषार्थ करना पड़ता है l सम्यक दर्शन के बाद सतत सम्यक ज्ञान प्राप्त करने पर सम्यक चारित्र पालन करने की भावना बनती है l

सम्यक चरित्र का पूर्ण रुप से पालन करते हुए उपयुक्त काल तथा सम्यक पुरुषार्थ से मोक्ष प्राप्त होता है l आत्मा के अनंत गुणों को जानने के लिए अनेकांत का वर्णन है l निश्चय अर्थात आत्मा में तन्मय हो जाना l अनेकांत धर्म को भावात्मक रूप से ,श्रद्धा, प्रज्ञा, व्यवहार से पालन नहीं होने के कारण विवाद होते हैं l गेंद के किसी भी भाग पर बिंदु लगाने पर वह केंद्र में ही आता है, वैसे ही अनेकांत केंद्र बिंदु है l जो भद्र मिथ्या दृष्टि है वही सम्यक दर्शन प्राप्त करेगा l लाखों जीवो के योगदान से हम एक ग्रास भोजन कर पाते हैं l लाखों श्रमिकों का सहयोग रहता है l वैसे ही मोक्ष मार्ग अनंत भव का स्वयं का योगदान, भाव, गुरु उपदेश आदि से जीव स्वयं ही पुरुषार्थ करता है l सरल रेखा में अनंत बिंदु अनंत एटम्स होते हैं, परंतु पहले बिंदु का महत्व अधिक होता है l सम्यक दर्शन होने के बाद अनेक अथवा कुछ भव मैं अथवा उसी भव में भी मोक्ष प्राप्त हो सकता है।

यह जीव के स्वयं के पुरुषार्थ पर निर्भर करता है l परंतु मोक्ष प्राप्त करने की टिकट कंफर्म हो जाती है l सम्यक दृष्टि शरीर और आत्मा को भिन्न-भिन्न मानता है l आत्म स्वरूप के विपरीत श्रद्धा होने से सम्यक दर्शन नहीं होता l आत्म स्वरूप जानने के बाद उसको प्राप्त करने की कोशिश की जाती है l स्व आत्मा वैभव का ज्ञान होता है l आत्मज्ञान से आत्म शक्ति जागृत होती है l आत्मरूप आत्म स्वरूप में है l आचार्य श्री कहते हैं धर्म का केंद्र विश्व का केंद्र तुम स्वयं हो l आत्मज्ञान के बिना सप्त तत्व, नो पदार्थ का ज्ञान कुछ कार्यकारी नहीं l जब तक भौतिकता, मोह, माया, अहंकार, ममकार होगा l तब तक जीव स्वयं को नहीं समझ पाता l आचार्य श्री कहते हैं तुम आत्मा नहीं हो तो तुम धर्म किसके लिए करते हो l चैन में अरबों खरबों कड़ियों को जोड़ना पड़ता है जुड़े बिना चैन नहीं बनती वैसे ही

सम्यक दर्शन में उसके अनेक अंग को शंका रहित होकर अपनाना आवश्यक है l सर्वज्ञ भगवान ने जो कहा है उस पर दृढ़ श्रद्धा रखनी चाहिए l आत्म स्वरूप में शंका नहीं करना सम्यक दर्शन का प्रथम अंग है l धर्मके अनंत बिंदुओं की रेखा में प्रमुख बिंदु शंका रहित होना है l पहले हम सब लोगों में आत्मा का विपरीत श्रद्धा होने से सब प्रकार की धार्मिक क्रियाएं तथा ज्ञान विपरीत था l भाव मिथ्यात्व होने पर समस्त धर्म-कर्म सब मिथ्या ही रहेगा l

विजयलक्ष्मी गोडावत से प्राप्त जानकारी के साथ

अभिषेक जैन लुहाडीया रामगंजमडी

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