अमृत तत्व की उपलब्धि है समाधिमरण आचार्य कनकनन्दी
गलियाकोट


ध्यान योगी वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदी गुरुदेव ने क्षुल्लिका 105 पराग श्री माता जी के समाधि मरण के बाद एवम डोल यात्रा से पहले धर्म सभा को संबोधित करते हुए बताया कि अमृत तत्व की उपलब्धि समाधि मरण है।केवल भूखे प्यासे रह कर मरना समाधि मरण नहीं है ।


इसका भावार्थ समझाते हुए उन्होनें कहा समाधि मरण में आत्मा का ध्यान करते हुए, कषायो को क्रश करते हुए, समता पूर्वक शरीर से ममता को छोड़कर, स्वयं में लीन होना समाधि मरण है। साधु साध्वी ब्रह्मचारी परिवार के लोग अन्य लोग जो भी समाधि मरण के समय उनके आत्मध्यान में सहयोगी होते हैं, सेवा करते हैं, वे शिखरबंदी 1000 मंदिर बना कर पंचकल्याणक करने का पुण्य कमाते हैं।


समाधि मरण के अंतर मुहूर्त बाद साधु साध्वी किसी का भी शरीर हो शरीर में गर्मी कम श्वास नही होने के कारण, शरीर में ब्लड सरकुलेशन नहीं होने के कारण, अनंत अनंत मनुष्य जाति के पंचेेंद्रीय निगोदिया जीव एक इंद्रियों से लेकर पंच इंद्रिय तक अनेक सूक्ष्मजीव पड़ जाते हैं। इसलिए अंतर मुहूर्त में ही पार्थिव शरीर का संस्कार कर देना चाहिए।
आचार्य भगवन ने आगे कहा जो भी दान देना है स्वेच्छा से अवश्य देना चाहिए। क्योंकि श्रावक के दो मुख्य कर्तव्य हैं दान एवं पूजा परंतु बोलियों के लिए समय व्यर्थ नहीं गंवाना चाहिए। दूर से आने वाले लोगों का इंतजार भी नहीं करना चाहिए। अन्य लोगों का या परिवार के लोगों का शोषण नहीं करना चाहिए। जो जीवंत साधु को आहार दान नहीं करते, वह भी छतरी तथा बोलियों मैं करोड़ों रुपया देकर अपनी प्रसिद्धि चाहते हैं, यह धर्म नहीं है।
स्वेच्छा से अवश्य करोड़ों रुपए दान देना चाहिए ।
संकलित अभिषेक जैन लुहाडीया रामगंजमडी
