चारित्र के बिना व्यक्तित्व वैसा ही है, जैसे खुशबू के बिना फूल। संभवसागर महाराज

JAIN SANT NEWS खुरई

चारित्र के बिना व्यक्तित्व वैसा ही है, जैसे खुशबू के बिना फूल। संभवसागर महाराज

खुरई

शनिवार की प्रातःबेला मे प्राचीन जिनमन्दिर मे विराजित निर्यापक श्रमण मुनि श्री संभवसागर जी महाराज ने दीक्षा दिवस की पूर्व मंगल बेला मे अपने उद्बोधन मे चारित्र की महत्ता को बताया। अमृतमयी वचनों मे मुनि श्री ने कहा चारित्र के  बिना व्यक्तित्व वैसा ही है, जैसे खुशबू के बिना फूल।

इस पर विशेष रूप से बोलते हुए मुनि श्री  ने कहा व्यक्तित्व के-विकास का प्रमुख अंग चरित्र होता है। चारित्र हमारे आत्मविश्वास का मूल मंत्र हुआ करता है। व्यवहार की छोटी-छोटी बातें ही व्यक्ति के चारित्र का दर्पण होती है। शिक्षा का का लक्ष्य चारित्र-निर्माण होना चाहिए। शिक्षा वही कहलाती है जिसके द्वारा साहस का विकास हो, गुणों में अभिवृद्धि हो और बडे उद्देश्याें के प्रति लगन जागे। जीवन मे हमारी प्रथम और प्रधान आवश्यकता है हमारे चारित्र का निर्माण हो।  मुख्य  रूप से मुनि श्री ने कहा चारित्र ही सफलता अथवा असफलता का द्योतक है। चारित्र सफल है तो जीवन भी सफलता की ओर बढ़ेगा, किन्तु चारित्र ही असफलता की ओर अग्रसर है, तो जीवन अवश्य पतनोन्मुख होगा उन्हाेंने कहा कि चारित्र व्यक्ति के आंतरिक गुणों से संबंध रखता है। चारित्रवान के व्यक्तित्व में निर्मलता की चमक रहती है एवं उसकी वाणी में सरलता व स्पष्टता झलकती है। उसके व्यक्तित्व में चुंबकीय आकर्षण होता है, जो लोगों को अपनी ओर अनायास ही आकर्षित करता है। पाप क्रियाओं से बचकर पुण्यरूप क्रिया में लगना ही चारित्र है।

अंत मे मुनि श्री ने कहा नैतिकता व मानवीयता जैसे गुणों का नाम ही चारित्र है। चारित्र एक ऐसा हीरा है, जो प्रत्येक पत्थर को मूर्ति बना सकता है। चारित्र एक वृक्ष के समान और ख्याति उसकी छाया। उन्हाेंने कहा कि चारित्र वह महान गुण है, जिसकी कृपा से हमारा विश्वास और ज्ञान पूर्णता को प्राप्त करता है।

संकलित अभिषेक जैन लुहाड़ीया रामगंजमंडी

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