गृहस्थ जीवन में आपसी शांति एवं सदभावना से ही स्वर्ग-नरक की अनुभूति होती है। संभवसागर महाराज
खुरई
विगत दिनों से पूज्य मुनि श्री संभवसागर महाराज नगर के प्राचीन जिनमंदिर मे पावन ग्रन्थ मूकमाटी का वाचन कर जन जन को सदउपदेश प्रदान कर रहे है। उन्होने गृहस्थ जीवन के विषय पर प्रकाश डालते हुए कहा गृहस्थ जीवन में आपसी शांति एवं सदभावना से ही स्वर्ग-नरक की अनुभूति होती है। उन्होने कहा जिस घर में कलह होती है वहां पर कभी भी सुख शांति नहीं हो सकती।
समन्वय व सम्मान पर जोर दिया
पूज्य मुनि श्री ने उदबोधन मेसमन्वय व सम्मान पर जोर दिया और कहा हमे कोई भी कार्य समन्वय के साथ करना चाहिये हम एक दूसरे का मान सम्मान रखें, कषायों से दूर रहें। मोह, मान, माया, लोभ ऐसी कषाएं हैं,जिनसे संयम के मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति भी पूर्ण रूपेण नहीं बच सकता। सच्चे देव, शास्त्र गुरू की शरण में ही स्वर्ग का वास होता है। उन्हाेंने कहा कि छोटी-छोटी बातों में तनाव करना ठीक नहीं, यहीं पर स्वर्ग है और यहीं पर नरक है।
भक्ति का फल तभी हमको प्राप्त होगा जब हम अंतरंग भाव से धर्म आराधना करेंगे।
भक्ति और स्वाध्याय का महत्व बताते हुए मुनि श्री ने कहा आपके किसी भी धार्मिक अनुष्ठान करने, जाप, तप, विधान, पूजन आदि करने से किसी को व्यवधान नहीं उत्पन्न होना चाहिए। हमे भक्ति का फल तभी हमको प्राप्त होगा जब हम अंतरंग भाव से धर्म आराधना करेंगे। स्वाध्याय का बहुत महत्व है, स्वाध्याय को परम तप भी कहा गया है। इस पर विशेष बोलते हुए कहा की स्वाध्याय से ही विनय का मार्ग खुलता है। और विनय से ही मोक्ष का द्वार खुलता है। व्यक्ति को अपनी इच्छाओं पर विजय प्राप्त करने के लिए सतत प्रयास करते रहना चाहिए। वह अपने परिणामों में निर्मलता बहुत जरूरी है। जब आप दूसरों के लिए अच्छा सोचेगे तो ही आपका अच्छा होगा।
मन आनंद का भूखा है।
पूज्य मुनि श्री ने भाव भीनी वाणी मे कहा मन हमेशा आनंद का भूखा रहा है। आनंद की भूख उसका स्वभाव है। इसी स्वभाव के कारण वह संसार के बाहरी सुखों में भटकता रहता है। उसे सुख के अक्षय केन्द्र आनंदमय आत्मा में लगा दें। आत्मानुभूति ही सबसे बड़ा सुख है। मन को जिस क्षण इस सत्य पर श्रद्धा हो जाएगी, उस क्षण मन पर किसी भी प्रकार का प्रतिबंध नहीं लगाना अड़ेगा। हम जिस दिन अपने में इतना आत्मविश्वास पैदा कर लेंगे कि जगत के संपूर्ण आर्कषण झूठे हैं, यह हमें अन्ततः दुःख ही देंगे, तो मन की दिशा स्वतः ही बदल जाएगी। इस प्रकार आत्म शक्ति के बल पर ही, मनुष्य अपनी इंद्रियों एवं मन पर नियंत्रण कर सकता है। मन के मैल को धोने का उत्तम साबुन है अच्छी पुस्तकें।
उन्हाेंने कहा कि मन को आत्मा में लगाना ध्यान है। ध्यान से मन एकाग्र होता है। ध्यान और स्वाध्याय मुक्ति पथ के पवित्र पथ हैं। मन को स्वाध्याय व ध्यान का सहारा लेकर सतत अभ्यास के द्वारा उस पर अधिकार करके अपने अनुकूल बनाना होगा। आज मनुष्य भौतिक दृष्टि से कितना अधिक सम्पन्न हो गया है, फिर भी वह मानसिक रूप से दुःखी है। , क्योंकि मनुष्य के जीवन से धर्म और अध्यात्म उठ गया है। सांसारिकता की चकाचौंध में भ्रमित मन आत्मा से साक्षात्कार नहीं कर सकता।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़ीया रामगंजमंडी
