विद्याधर से विद्यासागर

*☀विद्यागुरू समाचार☀* विद्याधर से विद्यासागर

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ब्रह्मचारी विद्याधर देखते ही देखते हो गए पूज्य मुनि १०८ श्री विद्यासागर। समूह शांत है। विद्या के दर्शन में मग्न अपार जन्मेदनी की लालसापूर्ण हुई है। सब की आँखों में विद्याधर बालयति महावीर की तरह समाते जा रहे हैं। कोई आँखें हटाने तैयार नहीं है, एक टक देख रहे हैं।

सदलगा की धूल बन गई सेहरा का फूल मंच के पार्श्व में खड़े रहते हैं विद्याधर के वे भक्त जो रुपये पच्चीस हजार की राशि दान कर दीक्षा-संस्कार में माता-पिता का महान् पद प्राप्त कर सके थे। वे उस दिन नगर अजमेर का गौरव बन गए थे।

श्री हुकुमचंद जी लुहाड़िया और उनकी धर्म पत्नी श्रीमती जतन कँवर जी ने वह यश प्राप्त किया था, जो सदलगा स्थित माता-पिता बीस वर्ष पूर्व ही ले चुके थे। उसी दिन अजमेर के इस धर्मज्ञ दम्पत्ति ने मुनिवर ज्ञानसागरजी से आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत प्राप्त कर अपना भव सफल कर लिया।

तब तक एक सज्जन माइक पर अनुरोध करते हैं मुनिवर ज्ञानसागरजी से वे अनुरोध स्वीकार कर प्रवचन प्रारम्भ करते हैं। सब ज्ञान की वाणी में लीन हो जाते हैं। ज्ञानसागर के रहस्य को समझने का प्रयास करते हैं।

पोस्ट-97…शेषआगे…!!!

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