● प्राकृत जैनागम मूलग्रन्थ स्वाध्याय●

।।स्वाध्याय परमं तपः।। ● प्राकृत जैनागम मूलग्रन्थ स्वाध्याय●

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Day 18 : : तत्त्वसार गाथा 34 – 35
ग्रंथकार- आचार्य देवसेन स्वामी
प्रस्तुति- डॉ. पुलक गोयल, जबलपुर

पर-दव्वं देहाई
कुणइ ममत्तिं च जाम तेसुवरिं।
परसमय-रदो तावं
बज्झदि कम्मेहिं विविहेहिं।।34।।

रूसइ तूसइ णिच्चं
इंदिय-विसएहि वसगओ मूढो।
सकसाओ अण्णाणी
णाणी एत्तो दु विवरीदो।।35।।

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तत्त्वसार | आचार्य देवसेन स्वामी | द्रव्यानुयोग | गाथा 01-74 | शुद्ध पाठ | शब्दार्थ | व्याकरणिक विश्लेषण | व्याख्या | डॉ. पुलक गोयल :

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