शेयर 🤗 #विद्याधरसेविद्यासागर (किताब)😍
इस प्रकार की चर्चाओं में जो रहस्य रहता हो, पर बतलाने वाले अपने मधुर संबंधों का वर्णन ही करना चाहते थे और कुछ नहीं। यही तो सांसारिकता का उच्च आदर्श है। प्रिय व्यक्ति जितनी दूरी पर जाता है, उसका स्मरण उतना ही अधिक आता रहता है।
वहीं, बैठे-बैठे, चुपचाप सुन रहे थे सदलगा के विशिष्ट नागरिक, कहें पंच, श्री अन्ना साहिब पाटिल। बस्ती के बड़े मंदिर के सामने है उनका मकान। घर से मंदिर को निकलते तो विद्या को बुला लेते, फिर मिलकर पूजन-अभिषेक करते। वे उस रोज सबकी चर्चा में सम्मिलित नहीं हुए और शांत बैठे रहे।
कौन जानता था कि शांत बैठकर कुछ सोचने वाले पाटिल साहब विद्याधर के गृह त्याग से प्रेरणा ले रहे थे मन ही मन (उनका सोचना यही हुआ, वे कालान्तर में ऐलाचार्य (अब आचार्य प्रवर) मुनिवर विद्यानन्द जी से दीक्षा प्राप्त कर लेने में सफल भी हुए।) माता-पिता का सोच ऐसे समय क्यों रुकता, पुत्र को लेकर मोह ममत्व का हिमालय तो वहीं होता है। उन्हें घर में कुछ भी कैसे अच्छा लगता? कुछ अच्छा बनाकर खाने की इच्छा तक खत्म हो गई। दृष्टि बोझिल रहती।
इस दरवाजे पर वह हाथ रखकर खड़ा होता था, इस कुर्सी पर धम्म से बैठता था, इस पलंग पर चुपचाप सोता था। यही बोध लदा रहता आँखों पर।
त्यागी विद्याधर का सदलगा कुछ समय के लिए मोह का गढ़ बन गया था। वहाँ का वह हर प्राण जो विद्या को जानता था, मोहासक्त हो गया।
पोस्ट-83…शेषआगे…!!!
