विद्याधर से विद्यासागर

*☀विद्यागुरू समाचार☀* विद्याधर से विद्यासागर

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ममता और वात्सल्य की मूर्ति माने जाने वाले एक सेठजी ब्रह्मचारी विद्याधर की धोती पर दृष्टि रोपे थे। वे रोज दर्शनोपरान्त सोचते कि ब्रह्मचारी विद्याधरजी यह मोटी धोती हटाकर उनके द्वारा लायी गयी फाइन (अच्छी) धोती धारण कर लेते तो अच्छा रहता। वे जो ‘फाइन’ धोती लाये थे, कीमती थी, कोमल भी। पर विद्याधर को दे नहीं पा रहे थे।

एक दिन सेठ जी ने गुरुवर ज्ञानसागरजी से पूछा- महाराज श्री कृपया यह तो बताइये कि ब्रह्मचारी गणों को कितने दिनों में अपना पुराना अधोवस्त्र बदल देना चाहिए? ज्ञानसागरजी ने सहज भाव से कह दिया जब वह फटने लग जाय तब

उस दिन से तापस-भक्त सेठजी रोज भगवान् से यही प्रार्थना करते कि ब्रह्मचारी विद्याधर की पुरानी धोती फट जाये। देखते-देखते वे थकने लगे, पर उनकी मोटी धोती फटने का नाम ही न ले रही थी।

आखिर एक दिन सेठ जी को उसमें एक छोटी सी खोप लगी हुई दिख गई। वे दौड़ते हुए घर पहुँचे और पूर्व में खरीदकर रखी गई कीमती

धोती लेकर ब्रह्मचारी जी के समक्ष जा पहुँचे। श्रद्धा उड़ेलते हुए बोले-

ब्रह्मचारी जी, आपकी धोती फटने लगी है, कृपया उसे बदलकर यह नई धारण कर लीजिए। चौंक गये विद्याधर गुरु जी से पूछे बगैर यह सब कैसे संभव है? और फिर पुरानी धोती अभी फटी कहाँ है, उसमें तो एक छोटा सा छिद्र निकल आया है। बस सहज होकर बोले- सेठजी, अभी पुरानी धोती ठीक है।

-नहीं ब्रह्मचारी जी, वह फट गई है। फटी नहीं, उसमें छिद्र हुआ है।

  • तो भी आप बदल लीजिए।
    नहीं बाबा, अभी आवश्यकता नहीं है।
    बात न बनते देख, भक्ति और प्रेम में बंधे सेठ ने पैंतरा बदला- मैंने गुरुजी से पूछ लिया है, वे भी कहते हैं।

पोस्ट-78…शेषआगे…!!!

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