शेयर 🤗 #विद्याधरसेविद्यासागर (किताब)😍
नटहलस्वीकृतनभेंट:
हृष्ट-पुष्ट, गोरे- चिट्ठे, विनम्र, लजीले युवक को ब्रह्मचारी वेष में देखकर सभी का जी जुड़ाता था जिसका जी जुड़ाता वह आपोआप विद्याधर की बड़ी-बड़ी आँखों से भी जुड़ जाता था।
लोग घर पहुँचकर कमल की तरह खिलते हँसते उनके नेत्रों को क्षणभर भी न भूल पाते। हर माता-पिता अपने पुत्र को देखना चाहता उनकी छवि में। हर बहन अपने भाई को खोजती उस मनोहर स्वरूप में और हर युवक अपना ही चेहरा देख लेना चाहता था विद्या के चेहरे पर।
लोगों का वात्सल्य भाव प्रबल हो पड़ा। सभी प्रिय विद्याधर को कुछ न कुछ देना चाहते थे, परन्तु विद्याधर थे अपरिग्रह पथ के यात्री…क्या ले सकते थे?
दिन में एक बार शुद्ध आहार लेने के बाद वे समाज से कुछ भी ग्रहण नहीं करना चाहते थे, मात्र गुरुवर से जो और जितना ग्रहण हो जाये, वह बहुत है। मगर श्रद्धालु समाज कब मानने वाला था, कोई सज्जन ग्रन्थ लाकर विद्या को देना चाहते तो कोई पेन, कोई कागज, तो कोई सफे द वस्त्र धोती।
लोग लाते प्रयास करते पर विद्याधर मना कर देते। वे कुछ भी न लेते । श्रावक दुखी होकर अपनी वस्तुएँ वापस ले जाते और टोह में रहते कि कभी कुछ दे पाऊँ तो धन्य हो जाऊँ।
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