शेयर 🤗 #विद्याधरसेविद्यासागर (किताब)😍
सुबह दोनों को तड़के उठने की आदत थी। दोनों उठे भी और अपने-अपने कार्य में लग गये।
कजौड़ीमलजी ज्ञानसागरजी के दर्शन कर बैठ ही रहे थे कि उन्होंने पूछ लिया। क्यों, ध्यान दिया था रात में?
- दिया था, महाराज मैं जितनी बार उठा, वे मुझे जागते-पढ़ते ही मिले। अच्छा ध्यान लगता है उनका पढ़ने में बड़ा होनहार शिष्य है आपका। सेवा और अध्ययन में ही उसका ध्यान रहता है। रात्रि आठ बजे से एक बजे तक पढ़ते हैं और सुबह साढ़े चार बजे उठकर पुनः प्रभाती आदि में लग जाते हैं। मैंने अपनी आँखों से देख लिया है।
कजौड़ीमल को सुनकर श्री ज्ञानसागरजी महाराज को खुशी होना स्वाभाविक थी। पुत्र की प्रशंसा से प्रसन्न होते पिता की तरह, शिष्य की प्रशंसा से गुरु की छाती फूलकर दूनी हो गई। उन्हें लगा कि उनका यह प्यारा शिष्य अभी तक कहाँ छुपा था? यह और पहिले क्यों नहीं आ गया अजमेर ?
सेवा और समर्पण के भाव ने पथ प्रशस्त किया और गुरु का उपदेश मिलने लगा विद्याधर को धीरे-धीरे ज्ञानसागरजी विद्याधर को पढ़ाने का समय देने लगे। थोड़ा, फिर अधिक, फिर और अधिक।
तीसरे माह से यह हाल कि वे विद्याधर को पढ़ाने में चार घंटों से लेकर आठ घंटों तक का समय देने लगे। खुद तो पढ़ाते ही, पंडित महेन्द्रकुमार शास्त्री भी उन्हें पढ़ाने पहुँचने लगे।
संस्कृत, कभी हिन्दी ग्रन्थ पर ग्रन्थ उल्टे जाने लगे। पंडित महेन्द्रकुमार शास्त्री ही आगे चल कर मुनि समतासागर बने थे और आत्मविकास का श्रेष्ठ गौरव पाया था। वे विद्याधर को पढ़ाते समय बड़े सचेत रहते थे। एक दिन का पाठ दूसरे दिन तक पूर्णरूपेण याद हो जाने पर ही वे विद्याधर को अगला पाठ पढ़ाते थे।
रात्रि में ९ से १० का समय ‘उनका समय’ होता था। व्याकरण का मान्य ग्रन्थ, कातंत्ररूपमाला, शास्त्री जी ने पढ़ाया था। छन्द शास्त्र का अध्ययन भी उन्हीं ने कराया था।
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