विद्याधर से विद्यासागर

*☀विद्यागुरू समाचार☀* विद्याधर से विद्यासागर

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वे पवित्र हाथ : तभी अनन्त की दृष्टि पड़ी कक्ष की दीवाल पर लगाए गए उन चित्रों पर जिन्हें विद्याधर स्वेच्छा से खरीदकर लाए थे और फ्रेम करा कर अपने हाथों जिन्हें दीवाल पर टांगा था।

इन्हीं चित्रों से उनकी रुचि समझी जा सकती थी, पर कोई न समझा, सब यही समझते रहे- “वह कक्ष सजा रहा है, वह दीवाल सजा रहा है” बस।

काश कोई जान पाता कि वे दीवाल या कक्ष से परे अपने अंतर्कक्ष की सजावट में लीन हो रहे हैं। वे चित्र साधारण नहीं थे। उनमें एक था तत्कालीन आचार्य प्रवर शांतिसागर मुनिमहाराज का दूसरा था भगवान् महावीर की पतित पावन निर्वाण-भूमि पावापुरी का और इसी तरह कुछ अन्य अब वे चित्र केवल याद दिला रहे हैं पवित्र हाथों की। वे बन गए हैं एक यादगार किसी महामानव के गृहत्याग की प्रवृत्ति की ।

कुछ दिनों से एक नई आदत बन गई है। पहले पैसे जोड़कर पिक्चर देख आता था। अब जेब खर्च जोड़कर धार्मिक आयोजनों में पहुँचने का प्रयास करता है। पंचकल्याणकों या मेलों में पाँच-छह दिन तक अपनी जेब खर्च की राशि के बल पर टिका रहता है।

आज वह सात दिन बाद मेला से लौटा है। पिताजी डांटते हैं बिना पूछे क्यों गये थे? वह चुप रहा आता है। प्रश्न दोबारा होता है। वह णमोकार मंत्र कहने लगता है। सब कुछ शांत हो जाता है।

घर छोड़ते छोड़ते वह कृषि कार्य पूरा करा गया था। क्यों? खासतौर से बोनी के समय उसने जी तोड़कर कार्य किया था। क्यों? जब जाना ही था तो क्या मेहनत, क्या बोनी? उसके द्वारा बोया गया बीज का हर दाना अधिक फसल लेकर लौटा था क्यों? उस वर्ष अन्य वर्षों की तुलना में अधिक फसल हुई थी, क्यों? क्या होनहार तपसी के हाथ में कोई जादू था, या था वह उसका पुन्याश्रित कृत्य ? पवित्र हाथों द्वारा किये गये कार्य का परिणाम था या था अहिंसक विद्या पर प्रकृति का प्यार भरा उपहार ? क्या था। आखिर वह?

विद्या अपने हाथों से शायद धर्म बीज डाल गया था खेतों में अहिंसा, अपरिग्रह और अचौर्य की फसल उगाने।

पोस्ट-60…शेषआगे…!!!

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