विद्याधर से विद्यासागर

*☀विद्यागुरू समाचार☀*

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😊#सड़कचलतेजाप -एक मायने में उस घर का हर सदस्य कल्पनाचारी हो रहा था विद्या की अनुपस्थिति से विद्या के प्रार्थक्य से महावीर बाबू की आँखों में भी उस क्षण एक फिल्म चल रही थी। वे देखते और संबोधते जाते थे अपने ‘स्व’ को सबसे पहले उन्होंने देखा कि उनका भाई अठारह वर्ष का हो गया है। फिर भी कहीं घूमने निकलता है तो हाथों को जादा घुमाता / फिराता/मटकाता नहीं है, युवकोचित हास्य-मजाक या ऊधमबाजी भी नहीं करता। चलते हुए भी हाथ पीछे बाँधे रहता है।

लोग-बाग इतना ही समझते हैं कि पीछे हाथ बाँधकर टहलने निकलता है, शांतचित्त पर… पर विद्या हाथों को भर नहीं बाँधे रहता, उसका अंगूठा और अंगुली मिलकर थिरकते रहते हैं, जैसे वह कोई जोड़ घटाना कर रहा हो कर रहा हो वणिकवृत्ति पर लदा हुआ हिसाब वे दृढ़ स्वर से बुदबुदाते हैं, वह हिसाब किस बात का करता? वह तो चलते-चलते भी णमोकार मंत्र का चक्र अंगुलियों पर प्रारम्भ रखता था।

उन्हें याद हो आता है। कोई पूछता-घर से मंदिर कितनी दूर है तो सामान्य व्यक्ति यही कहता यों ही कोई आधा फर्लांग विशेष व्यक्ति कहता बस करीब तीन मिनट का रास्ता है। पर विद्या इस प्रश्न का उत्तर कुछ भिन्न ही देता। वह कह देता करीब २८ बार णमोकार मंत्र कहे, उतना समय लगता है मंदिर पहुँचने में ऐसा हिसाब रहा है विद्या का।

पोस्ट-56…शेषआगे…!!!

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