।।स्वाध्याय परमं तपः।।

।।स्वाध्याय परमं तपः।।

सुविधिसागर जी महाराज ने पद्मपुराण में मूल संघ आम्नाय के सिद्धांतों के विपरीत जो बातें लिखी हैं उस पर एक प्रकरण में यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि पद्मपुराण के पर्व १७ श्लोक २६८ में जो गन्धर्व देव द्वारा मद्यपान करने का वर्णन आया है उसमें वर्णित गन्धर्व देव नहीं था अपितु एक विद्याधर मनुष्य था। अतः पद्मपुराण में गन्धर्व देव जो कि महाराज जी के तर्क के अनुसार तथाकथित विद्याधर मनुष्य था, द्वारा मद्यपान किया गया इसमे कोई मूल संघ आम्नाय के जैन सिद्धांत से विरोधाभास नहीं है 🙂

महाराज जी क्या आपने उसी १७ पर्व के श्लोक संख्या २७५, २७६, २७७, २७९ और पूर्ण प्रकरण पढ़ा है क्या ❓

✨श्लोक २७५ तबला बजाने में निपुण देव एकत्रित होकर गंभीर ध्वनि के साथ तबला बजा रहे थे तो बांसुरी बजाने में चतुर देव भौंह चलाते हुए अच्छी तरह बांसुरी बजा रहे थे ।।२७५।।

✨श्लोक २७६ – २७७ उत्तम आभा को धारण करने वाला यक्ष प्रवाल के समान कांति वाली तथा सुंदर उपमा से युक्त वीणा को तमूरा से बजा रहा था। तो स्वरों की सूक्ष्मता को जानने वाला गंधर्व क्रमको नहीं छोड़ता हुआ मध्यम, ऋषभ, गांधार, षड्ज, पंचम, धैवत और निषाद इन सात स्वरों को निकाल रहा था ।।२७६ – २७७।।

✨श्लोक २७९ वह देवों के गवैया जो हा-हा हू-हू हैं उनके समान अथवा उनसे भी अधिक उत्तम गाना गा रहा था और प्रायःकर गन्धर्व देवों में यही गाना प्रसिद्धि को प्राप्त है ।।२७९।।

➡️महाराज जी उपरोक्त श्लोकों से यह बात क्षीर समुद्र के जल की तरह साफ और मिश्रण रहित है कि इस प्रकरण में वर्णित गन्धर्व, देव जाती का ही जीव था क्योंकि उसके साथ अन्य देव विविध वाद्य बजा रहे थे और श्लोक २७९ में तो गन्धर्व देव का स्पष्ट उल्लेख आया है❗

➡️अब प्रश्न यह उठता है कि चाहे मद्य का अर्थ मदिरा हो अथवा आपके अनुसार सुहुमागुणम् पेय हो कोई भी देव जाती के जीव कवलाहरी नहीं होते❗ अतः क्या पद्मपुराण में जो लिखा है कि गन्धर्व देव द्वारा मद्य पान किया गया यह वर्णन जैन सिद्धांत के विपरीत नहीं है क्या❓

➡️आप अपने ज्ञान से ग्रंथों के अर्थ को बदल तो सकते हैं लेकिन जैन सिद्धांत ध्रुव हैं उनको तो भगवान भी नहीं बदल सकते❗ अतः निवेदन है कि पहले से भ्रमित समाज को और भ्रमित न करें🙏🏽

मूल पोस्ट के अंश निम्नलिखित हैं पाठक पद्मपुराण के इस पूर्ण प्रकरण को पढ़कर स्वयं निर्णय करें कि आर्ष परंपरा के सिद्धांतों के अनुसार पद्मपुराण प्रामाणिक ग्रन्थ है अथवा नहीं
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पद्मपुराण के पर्व १७ श्लोक २६८ व २७० में लिखा है कि गंधर्व देव ने मद्यपान किया

✨श्लोक २६८ तदनंतर जिस प्रकार गरुड़ साँप को नष्ट कर देता है उसी प्रकार गंधर्व सिंह को नष्ट कर बड़ा हर्षित हुआ और हर्षित होकर उसने महागुणकारी मद्य का पान किया ।।श्लोक २६८।।

✨श्लोक २७० गंधर्व की विदुषी स्त्री ने कहा कि हे नाथ मुझे अवसर दीजिए मैं इस समय कुछ गाना चाहती हूं क्योंकि मद्यपान के अनंतर उत्तम गाना गाना चाहिए ऐसा उपदेश है ।।श्लोक २७०।।

दिगम्बर जैन सिद्धांत👉🏽
📖मूल संघ आम्नाय के ग्रन्थ तिलोयपण्णत्ती अध्याय ६ गाथा संख्या ८७
में लिखा है कि

✨गाथा ८७ किन्नर आदि व्यंतर देव तथा देवियां दिव्य एवं अमृतमय आहार का मन से ही उपभोग करते हैं, उनके कवलाहार नहीं है ।।८७।।

📖 तिलोयपण्णत्ती अध्याय ८ गाथा ५५१ और ५५२ में लिखा है कि

✨गाथा ५५१ एक सागरोपम काल तक जीवित रहने वाला देव एक हजार वर्ष में दिव्य, अमृतमय, अनुपम और तुष्टि एवं पुष्टि कारक मानसिक आहार का भोजन करता है ।।५५१।।

✨गाथा ५५२ जो देव जितने सागरोपम काल तक जीवित रहता है उसके उतने ही हजारों वर्षों में आहार होता है। पल्य प्रमाण काल तक जीवित रहने वाले देव के पांच दिन में आहार होता है ।।५५२।।

➡️उपरोक्त गाथाओं के अनुसार मूल संघ आम्नाय का स्पष्ट दिगम्बर जैन सिद्धांत है कि देवों के मानसिक आहार होता है अर्थात उनके मन में आहार का विकल्प उठते ही उनके कंठ से अमृत झरने लगता है।

देव मद्यपान तो क्या अन्य पेय भी नहीं पीते हैं क्योंकि उनके कवलाहार नहीं होता।

📖सभी स्वाध्यायशील श्रावकों से निवेदन है कि आपको ऐसे ही भ्रमित किया जाता है अतः आप स्वयं पूर्ण प्रकरण पढ़े बिना कोई धारणा न बनाएं🙏🏽

📜सुविधिसागर जी महाराज द्वारा इस विषय पर दिए गए तर्कों की सलग्न pdf अवश्य देखें

सकल दिगम्बर जैन समाज✍🏽

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