विशेषजिज्ञासासमाधान😍 #सार👌– निर्यापक श्रमण मुनिश्री #सुधासागर जी महाराज🙏
1) किसी भी मन्त्र या पाठ का स्मरण तो अशुद्ध अवस्था में किया जा सकता है, परन्तु इसका जाप आदि शुद्ध अवस्था में शुद्ध स्थान पर ही करना चाहिए।
2) जैन दर्शन में होली का कोई उल्लेख नहीं है। यह मात्र एक लोक परंपरा है।
3) लॉकेट-ताबीज आदि पहने का कोई उल्लेख नहीं है यह मात्र भट्टारकों के द्वारा चलाई गई एक तांत्रिक क्रिया है। इसका सिर्फ साइक्लोजिकल इफेक्ट पड़ता है, इससे ज्यादा कुछ नहीं।
णमोकार मंत्र, भक्तामर आदि के ताबीज बाँधना मन्त्र का अविनय है। हम इनकी शुद्धि का पूरा ध्यान नहीं रख पाते । इससे बचना चाहिए।
4) भक्तामर पाठ के द्वारा जल तैयार करके पीना एकदम गलत है। यह जल पवित्र हो जाता है फिर पवित्र वस्तु को पीना नहीं चाहिए। पवित्र वस्तुओं को नौ मल द्वारों में कभी नहीं डालना चाहिए।
5) ऊपरी बाधा कुछ नहीं होती। यह मात्र साइक्लोजिकल प्रभाव है। परंतु यदि किसी व्यक्ति को कोई गलत वस्तु खिला दी जाती है तो उससे उसके शरीर पर विपरीत प्रभाव पड़ता है जिसके कारण शरीर सूखने लगता है।
6) ग्रहस्थ कभी आर्त ध्यान से बच ही नहीं सकता। ग्रहस्थ को संक्लेश परिणामों से बचने का मात्र एक उपाय है, कि वह अपने जीवन में 12 व्रतों को अंगीकार करे। और तत्व दृष्टि रखे।
7) वर्तमान में बड़े-बड़े शहरों में आधुनिकता के कारण अच्छे मुनियों की चर्या का निर्वाहन हो ही नहीं सकता। वहां मुनियों को अपनी चर्या से कंप्रोमाइज करना ही पड़ता है। यही कारण है की आचार्यश्री तीर्थ क्षेत्र में जाकर चातुर्मास करते हैं।
8) बड़े-बड़े पैकेज के प्रभाव में आकर जो संतान अपने मां-बाप को छोड़ देती है वह निकृष्ट है। आचार्य श्री इसी कारण हिंदी पर जोर देते हैं, जिससे हमारी प्रतिभाओं का पलायन ना हो।
9) जैन आगम में इस बात का कोई उल्लेख नहीं की जोड़ियां ऊपर से बनकर आती हैं। हमारे पाप और पुण्य के कारण जोड़ियां बनती और बनाई जाती हैं
10) पंच परमेष्ठी को याद करने से खुद पर दया हो जाती है। इसका अर्थ है कि व्यक्ति खुद को गलत मार्ग से बचा लेता है।
11) समय अभाव में छोटी पूजा कर लेने में कोई बुराई नहीं है, परंतु उतना हमें पुण्य बन्ध कम होगा।
12) धर्म अगर डर से भी किया जाए तो इसका कुछ ना कुछ पुण्य बंध तो होता ही है। जैसे बच्चा चाहे मम्मी के डर से दवा खाये परन्तु उसका असर तो पड़ेगा ही।
