।।स्वाध्याय परमं तपः।।

।।स्वाध्याय परमं तपः।।

📖मूलाचार की मूल गाथाओं में साधु के एकल विहार निषेध के प्रमाण

✨स्वच्छंदगदागदसयणणिसियणादाणभिक्खवोसरणे। स्वच्छंदजंपरोचि य मा मे सत्तुरिव एगागी ।150।
सोना, बैठना, ग्रहण करना, भिक्ष, मल त्याग करना, इत्यादि कार्यों के समय जिसका स्वच्छंद गमनागमन है, स्वेच्छा से ही बिना अवसर बोलने में अनुरक्त है, ऐसा एकाकी मेरा वैरी भी न हो।150।

✨गुरुपरिवादो सुदवोछेदो तित्थस्स मइलणा जउदा। भेंभलकुसीलपासत्थदा य उस्सारकप्पम्हि ।151।
गण को छोड़ अकेले विहार करने में इतने दोष होते हैं–दीक्षागुरु की निंदा, श्रुत का विनाश, जिनशासन में कलंक (जैसे-सब साधु ही ऐसे होंगे), मूर्खता, विह्वलता, कुशीलपना, पार्श्वस्थता।151।

✨कंटयखण्णुयपडिणियसाणागेणादिसप्पमेच्छेहिं। पावइ आदविवत्ती विसेण व विसूइया चेव ।152।
जो स्वच्छंद विहार करता है वह काँटे, स्थाणु, क्रोध से आये हुए कुत्ते, बैल आदि, सर्प, म्लेच्छ, विष, अजीर्णइनके द्वारा मरण व दुःख पाता है ।152।

✨गारविओ गिद्धीओ माइल्ली अलसलुद्धणिद्धम्मो। गच्छेवि संवंसतो णेच्छइ संघाडयं मंदो ।153।
शिथिलाचारी मुनि ऋद्धि आदि गौरववाला, भोगों की इच्छा वाला, कुटिल स्वभावी, उद्यम रहित, लोभी, पापबुद्धि, होता हुआ मुनि समूह में रहते हुए भी दूसरे को नहीं चाहता।153 ।

✨आणा अणवत्था विय मिच्छत्ताराहणादणासो य। संजमविराहणा वि य एदे दु णिकाइया ठाणा ।154।
एकाकी स्वच्छंद विहारी साधु को आज्ञाकोप, अतिप्रसंग, मिथ्यात्व की आराधना, अपने सम्यग्दर्शनादि गुणों का घात, संयम का घात, ये पापस्थान अवश्य होते हैं ।154।

✨तत्थ ण कप्पइ वासो जत्थ इमे णत्थि पंच आधारा। आइरियउवज्झायापवत्तथेरा गणधरा य ।155।
ऐसे गुरुकुल में रहना ठीक नहीं, जहाँ आचार्य, उपाध्याय, प्रवर्तक, स्थविर और गणधर ये पाँच मुनिराज संघ के आधारभूत न हों।155।

✨आइरियकुलं मुच्चा विहरदि समणो य जो दु एगागी। ण य गेण्हदि उवदेसं पावसमणोत्ति वुच्चदि दु ।959।
जो श्रमण संघ को छोड़कर संघ रहित अकेला विहार करता है और दिये उपदेश को ग्रहण नहीं करता है वह पापश्रमण कहा जाता है।959।

✨आयरियत्तण तुरिओ पुव्वं सिस्सत्तणं अकाऊण। हिंडइ ढंढायरिओ णिरंकुसो मत्तहत्थिव्वं ।960।
जो पहिले शिष्यपना न करके आचार्यपना करने को वेगवान है वह पूर्वापर विवेक रहित ढोढाचार्य है, जैसे अंकुशरहित मतवाला हाथी।960।

📖सूत्रपाहुड़ मूल गाथा में एकल विहार का निषेध

✨सूत्रपाहुड़/9 उक्किट्ठसीहचरियं बहुपरियंभो य गरुय भारो य। जो विरहि सच्छंदं पावं गच्छंदि होदि मिच्छत्तं।9। = जो मुनि होकर उत्कृष्ट सिंहवृत्ति रूप प्रवर्तता है, बहुत तपश्चरण आदि से संयुक्त है, बड़ा पदधारी है, परंतु स्वच्छंद प्रवर्तता है, वह पाप व मिथ्यात्व को ही प्राप्त होता है।1।

⛳जिनशासन जयवंत हो⛳

🛕जिनशासन संघ🛕

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